India and the CHOGM in Sri Lanka: Well Played, Actually

Published as जबिन टी. जैकब, ‘श्रीलंका पर सही फैसला’, Dainik Jagran, 12 November 2013.

Original text in English follows below

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस सप्ताह श्रीलंका में राष्ट्रमंडल देशों के शासनाध्यक्षों के सम्मेलन (चोगम) में भाग लेने नहीं जा रहे हैं। प्रधानमंत्री का यह फैसला एक राजनेता के साथ ही सरकार के मुखिया की हैसियत से लिया गया एक सुलझा हुआ निर्णय है। मीडिया के एक वर्ग द्वारा चोगम में प्रधानमंत्री के भाग न लेने को अनुचित ठहराना और इसे राजनीतिक दबाव में राष्ट्रीय हितों की बलि करार देना बिल्कुल गलत है। प्रधानमंत्री से सबसे पहली और महत्वपूर्ण अपेक्षा देश को चलाने की होती है और देश चलाते हुए उन्हें निर्वाचन प्रक्रिया से अपनी पार्टी को मिले जनादेश पर बराबर ध्यान रखना पड़ता है। निर्वाचन प्रक्त्रिया ही केंद्र में सरकार का स्वरूप निर्धारित करती है। ऐसे में सरकार पर गठबंधन के सहयोगी विभिन्न क्षेत्रीय दलों का प्रभाव स्वाभाविक ही है।

विदेश में भारत के राष्ट्रीय हितों और घरेलू राजनीतिक दबाव में अंतर्विरोध जरूरी नहीं है। किसी भी सूरत में कोई भी ऐसा राष्ट्रीय हित संभव नहीं है, जिसका घरेलू स्तर पर समर्थन न हो अथवा जिससे क्षेत्रीय अपेक्षाएं पूरी न होती हों। भारत का अंग्रेजीभाषी, विदेशों में भ्रमण करने वाला अभिजात्य वर्ग क्षेत्रीय पार्टियों को यह कहकर खारिज कर देता है कि उन्हें वैश्रि्वक क्षितिज पर भारत की वृहत्तार भूमिका की समझ नहीं है। किंतु ये लोग विदेश में भारत की लोकतांत्रिक पहचान का तर्ब ंढढोरा नहीं पीट पाएंगे अगर भारत एक तरफ तो अमेरिका के साथ संधियों को बढ़ावा दे और साथ ही बात जब पड़ोसियों के साथ संबंधों के मुद्दे पर आए तो श्रीनगर, गुवाहाटी, कोलकाता या चेन्नई के हितों को नजरंदाज कर दे। यही नहीं, श्रीलंका के मुद्दे पर तमिल राजनीतिक दल जिनमें सत्तारूढ़ दल व विपक्ष दोनों शामिल हैं, प्रधानमंत्री के श्रीलंका के दौरे के विरोध में एकजुट हैं। हमें इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि श्रीलंका के मसले पर तमिलनाडु का पूरा राजनीतिक वर्ग एकमत है।

यह सही है कि भारत-बांग्लादेश संबंध पश्चिम बंगाल सरकार के अल्पकालिक राजनीतिक समीकरणों के कारण बंधक बन गए थे, किंतु श्रीलंका में तमिल मुद्दे पर भारत के फैसले को घरेलू चिंताओं से इतर अन्य कारणों से भी उचित ठहराने के अनेक कारण हैं। एक पहलू इस सवाल में निहित है कि क्या भारत के विदेश सामरिक हितों के परिप्रेक्ष्य में चोगम में भाग न लेने का प्रधानमंत्री का फैसला सही है? इस सवाल के जवाब के कई आयाम हैं-भारत-श्रीलंका संबंध और तमिल समस्या, भारत के क्षेत्रीय हित और राष्ट्रमंडल जैसे बहुपक्षीय संगठनों में भाग लेने से इन हितों को साधने में मिलने वाली मदद। दरअसल, भारत-श्रीलंका संबंध अनेक स्तरों पर करीबी हैं। इनमें राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य संबंध शामिल हैं। अनेक स्तरों पर भारत के सहयोग के बिना कोलंबों में महिंदा राजपक्षे की सरकार लिट्टे का सफाया नहीं कर सकती थी। और इसलिए श्रीलंका प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कोलंबो न जाने के मुद्दे को भारत के खिलाफ लंबे समय में शायद ही इस्तेमाल करें।

दूसरा पहलू यह है कि लिट्टे पर जीत और फिर राष्ट्रपति पद पर पुनर्निर्वाचन के बाद राजपक्षे ने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ और श्रीलंका में स्वतंत्रता के अन्य मामलों पर कड़ा रुख अपनाया। इससे न तो श्रीलंका के लोकतांत्रिक मूल्यों की सही तस्वीर सामने आती है और न ही दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका स्थापित होती है। तमिल नागरिकों को समान अधिकार देने के लिए राजपक्षे ने श्रीलंका के संविधान में 13वें संशोधन का जो वायदा किया था वह भी पूरा नहीं किया। मनमोहन सिंह का कोलंबो और इसके बाद जाफना का दौरा राजपक्षे की नीतियों और अन्य ज्यादतियों पर मुहर ही लगाता और इससे तमिल अल्पसंख्यकों की मांगों की अनदेखी करने के लिए राजपक्षे का हौसला बढ़ता।

तीसरा पक्ष यह है कि कुछ शंकालू लोग यह भी कह सकते हैं कि क्योंकि मनमोहन सिंह ने चोगम सम्मेलन में भाग न लेकर मेजबान के रूप में राजपक्षे की छवि खराब की है इसलिए अब श्रीलंका के राष्ट्रपति तमिल समस्या पर और कड़ा रुख अपना सकते हैं। सबसे पहला खतरा तो यही है कि भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभाव बढ़ाकर भारत की घेराबंदी कर रहे चीन का अब श्रीलंका में दखल और बढ़ सकता है। एक हद तक यह संभव है, किंतु नई दिल्ली श्रीलंका में चीनी उपस्थिति को तब तक कम करने की स्थिति में नहीं है जब तक आर्थिक और व्यावसायिक रूप से यह दोनों देशों के हित में है। और इस मुद्दे पर भी, श्रीलंका भारतीय अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक घुला-मिला है, बनिस्बत चीनी अर्थव्यवस्था के। राजपक्षे इतने चतुर जरूर हैं कि उन्हें चीनी सीमाओं का भान है और वह समझते हैं कि श्रीलंका का विशाल पड़ोसी भारत उसके लिए बेहतर व्यापार साझेदार हो सकता है। यही नहीं, जहां तक चीन का संबंध है, श्रीलंका इतना छोटा खिलाड़ी है कि वह उसके लिए भारत से नहीं उलझ सकता या भारत में अपने हितों को दांव पर नहीं लगा सकता। इस प्रकार राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक दृष्टिकोण से भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बहुत सोच-विचार कर फैसला लिया है।

Not a Good Idea to Go
Obey the Rules of Traffic (and of Democracy)

जहां तक क्षेत्रीय संगठनों में भारत की भागीदारी का सवाल है, यह स्मरण रहना चाहिए कि चोगम उन अनेक बहुपक्षीय मंचों में से एक है जिनका भारत अंग है और संभवत: यह सबसे महत्वपूर्ण मंच नहीं है। हालांकि चोगम प्रधानमंत्री को भारत के पड़ोसी देशों से अधिक अनेक छोटे कैरेबियन और अफ्रीकी देशों के साथ, जिनसे भारत का नियमित व्यवहार नहीं है, मेल-जोल बढ़ाने का एक सुअवसर जरूर उपलब्ध कराता। इस दृष्टिकोण से जरूर भारत ने एक अवसर गंवाया है। भारत को बहुपक्षीय सहभागिता के अलग-अलग मंचों का अपना दायरा बढ़ाना चाहिए, ताकि इस प्रकार के किसी एक सम्मेलन में किसी भी कारण से भाग न ले पाने से होने वाली क्षति दूसरे मंचों से पूरी कर ली जाए। यह विदेश नीति का प्रधान नियम होना चाहिए कि सारे अंडे एक ही टोकरी में न रखे जाएं।

Original text…

Indian Prime Minister Manmohan Singh will not be visiting Sri Lanka to participate in the Commonwealth Heads of Government Meeting (CHOGM) to be held in mid-November. The decision was reached by the Prime Minister as much in his capacity as a politician as in his capacity as the head of government in charge of his country’s external national interests.

First, it is unfair to declare, as some media and foreign policy elites have done, that the Prime Minister has ‘surrendered’ the country’s national interests to political pressures.  The Prime Minister is first and foremost expected to run the government and run it keeping in mind the mandate that he and his party have received through the electoral process. That electoral process determined that the central government would be a coalition government with the strong influence of various regional parties that function as allies in that coalition.

There is no necessary contradiction between Indian national interests abroad and domestic political pressures at home. In any case, there is no national interest worth the serving if it is not supported domestically. India’s English-speaking, globetrotting elites are wont to dismiss regional Indian parties as not understanding India’s larger role in the global arena. But they cannot also harp on India’s democratic identity abroad when promoting ties with the United States or distinguishing itself from China and simultaneously expect New Delhi to ignore the interests of Srinagar, Guwahati, Kolkatta or Chennai when it comes to issues involving India’s neighbours. Moreover, in this particular case, Tamil political parties both in the ruling coalition and outside were united in their opposition to the Prime Minister’s visit.

True, the India-Bangladesh relationship has been held hostage in some respects to what appears like the current West Bengal government’s short-term political calculations but in the case of the Tamil issue in Sri Lanka, there is surely more to be said justifying New Delhi’s move than domestic concerns.

This brings us to the second aspect – has the Prime Minister made the right decision in terms of India’s external strategic interests by deciding not to attend the CHOGM?

The question needs to be addressed from several angles – India-Sri Lanka relations (including the Tamil question), India’s regional interests, and its aims and objectives from participation in multilateral organizations, including the Commonwealth.

One, India-Sri Lanka relations continue to be close at several levels, including the political, economic and military. Mahinda Rajapaksa’s government in Colombo could not have defeated the LTTE without Indian cooperation at various stages and so for the Sri Lankans to hold Prime Minister Singh’s non-participation against India would be going too far.

Two, the fact is that since his victory over the LTTE and his subsequent reelection as President, Rajapaksa has clamped down on his political opponents and other freedoms in Sri Lanka – neither a good advertisement for Sri Lanka’s democratic credentials nor for India’s role as a democratic model in South Asia. Rajapaksa has also not followed through on promises about implementing the 13th Amendment of the Sri Lankan constitution in full to ensure equal rights to Tamil citizens. Singh’s visit to Colombo and then to Jaffna would only have amounted to whitewashing Rajapaksa’s policies and other excesses and would have only emboldened him to ignore any demands from his Tamil minorities.

Three, the skeptics might say that Rajapaksa is going to do exactly the same now that Singh is not attending the CHOGM and putting a dent on his reputation as host. Indeed, the primary fear is that China which is seen as increasing its influence in India’s neighbourhood, will now receive greater leeway in Sri Lanka. That may well be so, but New Delhi cannot justifiably oppose Chinese presence or activities in Sri Lanka as long as they are in the economic and commercial realm, which is what it is primarily. And even here, Sri Lanka is far closely integrated with the Indian economy than it is with China. Rajapaksa is too canny an operator to not know that there are limits to what the Chinese can do for him when it is India that is his largest neighbour and trading partner. Further, from the Chinese point of view, Sri Lanka is too small a player for Beijing to risk running into a confrontation with New Delhi for. Thus, Prime Minister Singh is actually taking a well-considered decision even from a national security and strategic point of view.

Finally, in the context of India’s participation in regional organizations, it must be remembered that the CHOGM is only one of many multilateral forums that India is a part of and perhaps not even the most important one. The CHOGM is a rather useful opportunity for Prime Minister Singh to interact with not so much India’s South Asian neighbours but with several smaller African and Caribbean nations with whom New Delhi does not always maintain regular exchanges. It is from that point of view that an opportunity has been lost. But that then drives home the point that India should be broad-basing its multilateral interactions in multiple forums so that New Delhi can factor in such occasions as skipping a meeting for whatever reason. It should be a cardinal rule of foreign policy that you do not put all your eggs in one basket.

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