Foreign Policy under China’s New Leaders: What India can Expect

(original version in English follows below Hindi text)

चीन में नेतृत्व परिवर्तन की एक बड़ी कवायद पूरी हो चुकी है। कुछ दिनों पहले 18वीं नेशनल कांग्रेस में शी जिनपिंग को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बना दिया गया। अब तक यह कमान हू जिंताओ की पास थी। शी ने सेंट्र्ल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) के चेयरमैन का भी पद संभाल लिया है। यह एक अहम पद है और इसके जरिये वह चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के प्रभारी हो गए हैं। इसके साथ ही शी तीसरे अहम पद के तौर पर मार्च, 2013 में राष्ट्रपति का भी पद संभाल लेंगे।

अब सवाल यह है कि नए नेतृत्व के तहत चीन की विदेश नीति कैसी होगी?

सबसे पहले तो यह समझ लेना ज़रूरी है कि चीनी नेताओं के लिए असली चुनौती घरेलू मोर्चे पर होगी। इसलिए जरूरी नहीं कि विदेश नीति उनके संपूर्ण ध्यान और एकाग्रता के केंद्र में रहे। विदेश नीति के मोर्चे पर भी चीन दूसरे देशों की तुलना में अमेरिका से अपने संबंधों को सबसे ज्यादा तवज्जो देगा।

ओबामा प्रशासन ने अपने पहले दौर में मध्यपूर्व में नए सिरे से अपनी दिलचस्पी जाहिर की थी और वह वहां ‘री-बैलेसिंग’ की रणनीति के तहत सक्रिय रहा। अब बहुत से चीनी विश्लेषक यह मानते हैं कि दूसरे दौर में ओबामा प्रशासन एशिया में चीन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाएगा।

इस संदर्भ में चीन का भारत की तुलना में अमेरिका पर ज्यादा ध्यान होगा। हालांकि अगले दस साल की तुलना में भारत पिछले दिनों की तुलना में ज्यादा ध्यान आकर्षित करेगा। चीनी विश्लेषकों की निगाह में भारत तेजी से राजनीतिक और आर्थिक तरक्की की सीढिय़ां चढ़ रहा है। लिहाजा चीन भारत के उदय से पैदा शक्ति संतुलन को संभालने में लगा रहेगा या फिर इससे ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने की कोशिश करेगा।

एक रणनीति तो यह हो सकती है कि चीन व्यापार और निवेश बढ़ा कर भारत की आर्थिक तरक्की का लाभ ले। दूसरी रणनीति यह हो सकती है कि वह अपने खिलाफ भारत और अमेरिका के संयुक्त प्रयासों को सीमित करने की कोशिश करे। चीनी नेताओं की एक रणनीति यह भी हो सकती है कि भ्रष्टाचार, आय में असमानता और क्षेत्रीय विषमताओं सरीखी घरेलू समस्याओं की वजह से पैदा सामाजिक तनाव को काबू करने के लिए वे लोगों का ध्यान विदेशी नीति के मोर्चे पर पैदा विवादों में उलझा दें।

इसलिए चीन की ओर से हाल में जारी किए गए माइक्रो-चिप लगे पासपोर्ट पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इसमें चीन के मानचित्र पर दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशिया के उन इलाकों को दिखाया गया है, जिन पर वह अपना दावा जताता रहा है। भारत ने इसका जवाब दिया है। उसने चीनी नागरिकों को दिए जाने वाले वीजा में लगाए गए मानचित्र में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चीन को अपने क्षेत्र में दिखाया है।

आगे आने वाले दिनों में ऐसे कई गंभीर मुद्दे उठेंगे और भारत और चीन दोनों को इनसे जूझना होगा। पहला मुद्दा तिब्बत का है। तिब्बत में लगातार जारी अस्थिरता के मद्देनजर चीनी नेताओं को दलाई लामा और भारत में निर्वासित तिब्बत सरकार की गतिविधियों पर नजर रखनी होगी। चीन अपने आर्थिक और सैनिक हितों को देखते हुए तिब्बत में इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास का अपना काम नहीं रोकने वाला। लिहाजा भारत भी सीमा पर अपने रक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के कदम उठा सकता है। ये दोनों मामले मिलकर भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों में तनाव बढ़ा सकते हैं।

दूसरा मुद्दा अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी से जुड़़ा है। दो साल बाद अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी शुरू हो जाएगी। इससे अफ -पाक क्षेत्र में अस्थिरता में काफी इजाफा हो सकता है। यह देखने वाले बात होगी कि चीन इस स्थिति से कैसे जूझता है।

क्या चीन पाकिस्तान से नजदीकी संबंध बनाए रख हालात को काबू करने की कोशिश करेगा या फिर वह उसके सैनिक प्रतिष्ठानों को अपने लिये खतरा समझेगा? गौरतलब है कि  चीन के शिनजियांग प्रांत में अलगाववादी आंदोलन की जड़ें पाकिस्तान में ही हैं। शिनजियांग के कई अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान के मदरसों और आतंकवादी शिविरों में ट्रेनिंग मिली है। लिहाजा, चीन को यह समझना होगा अफ-पाक क्षेत्र में स्थिरता के लिए भारत के साथ लंबे और टिकाऊ रिश्तों को प्राथमिकता देनी होगी।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया में चीन का प्रभाव काफी बढ़ेगा। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देश निश्चित रूप से चीन से आर्थिक, राजनीतिक और संभव हुआ तो सैनिक सहयोग बढ़ाना चाहेंगे।

भूटान भी आने वाले दशकों में चीन से औपचारिक राजनयिक रिश्ते कायम करना चाहेगा। मगर यह सब भारत और चीन, दोनों के लिए बराबरी का मौका है। अगर भारत बाकी दक्षिण एशिया की समृद्धि बढ़ाने मे नाकाम रहा तो निश्चित तौर ये देश चीन के साथ मिलकर ऐसा करना चाहेंगे।

चौथा मुद्दा हिंद महासागर में चीन की महत्वाकांक्षा से जुड़ा है। आने वाले दिनों में वह इस क्षेत्र में अपना तेजी से विस्तार करना चाहता है। चीन, दुनिया समुद्री जहाज बनाने वाला सबसे बड़ा देश है। लेकिन उसकी नौसेना भारत से कमजोर रह गई है। आने वाले दिनों में चीन इस फासले को मिटाना चाहेगा।

अपने विशाल रक्षा बजट से चीन अपनी नौसेना को और मजबूत करना चाहेगा। इधर हाल के कुछ अभियानों से चीन की यह महत्वाकांक्षा जाहिर हो चुकी है। बहरहाल, भारत चीनी नौसेना  के कमजोर रहने से पैदा फासले का इस्तेमाल अपने फायदे में कर सकता है।

इस मौके का लाभ चीनी नौसेना के साथ सहयोगात्मक संबंध कायम करके लिया जा सकता है। हिंद महासागर में दोनों नौसेना संयुक्त अभ्यास कर सकती हैं और आपदा राहत के काम में हिस्सा ले सक ती हैं।

भारत को इस समय एक साथ दो रणनीतियों का सहारा लेना पड़ेगा। एक तो इसे अपनी सेना के आधुनिकीकरण के काम को लगातार जारी रहना होगा। इसके साथ ही इसे अमेरिका और चीन के पड़ोसियों के साथ भी बहुस्तरीय साझीदारी और सहयोग को बढ़ाते रहना होगा। इसके अलावा इसे आर्थिक, राजनीतिक, सैनिक और समाजिक मामलों पर चीन के नए नेतृत्व के साथ मिलकर काम करने की भी इच्छाशक्ति दिखानी होगी।

स्थिरता और समृद्धि बढऩे से चीन में माहौल और सुधरेगा और दूसरे देशों के साथ उसका दोस्ताना रुख भी मजबूत होगा। भारत और चीन के बेहतर संबंध के लिए शांतिपूर्ण माहौल बेहद जरूरी है। भारत को शांत और समृद्ध चीन से फायदा ही होगा।

originally published as जबिन टी. जेकब, “चीन से रिश्तों के नए सूत्र तलाशे भारत, Business Bhaskar, 27 November 2012, p. 4.

(original text)

China has seen a major leadership transition with Xi Jinping taking over as the new General Secretary of the Communist Party of China (CPC) from Hu Jintao at its 18th National Congress that concluded a few days ago. Xi has also taken over as Chairman of the Central Military Commission (CMC) – an important post that puts him in charge of the Chinese People’s Liberation Army and will take over his third formal position as President of China in March 2013.

What will China’s foreign policy under the new leadership look like?

At the outset, it must be understood that Chinese leaders realize that their greatest challenges will be domestic ones and hence foreign policy cannot ever receive their complete and undivided attention.

Even here, Beijing will be most concerned about its relations with the United States, than with any other country. A possible renewed American interest in East Asia had already been signaled in the first Obama administration with the so-called rebalancing strategy and many Chinese analysts now worry that after Obama’s reelection, Washington will now take a harder line against China in Asia.

In this context, while India will not receive as much attention as the US, it will certainly receive more attention in the next ten years than it did in the past. India’s economic and political rise is now a clear trend as far as Chinese analysts and policymakers are concerned and China would like also to be able to manage or benefit from this rise as much as possible. For one, China would like to gain from India’s economic growth by increasing its own trade and investments in India. For another, Beijing would like to prevent any Indo-US effort at containing China.

Meanwhile, it is possible that the massive social unrest created by China’s domestic problems such as corruption, income inequality, and regional disparities could tempt China’s new leaders to turn to foreign policy disputes as a way of deflecting attention from internal problems. Thus, recent news that China had begun issuing new micro-chip embedded passports containing a map of China including disputed territories in South and Southeast Asia should not be surprising.

While India has responded by issuing visas to Chinese nationals with a map of India showing Arunachal and Aksai Chin as its territories, there might be more serious issues ahead that the two countries will have to contend with.

One, given the continuing instability in Tibet, Chinese leaders will be forced to pay attention to the activities of the Dalai Lama and the Tibetan government-in-exile in India. Meanwhile, China’s massive infrastructure development programme in Tibet is likely to continue for both economic and military reasons. This is likely to be matched by India upgrading its own border defence infrastructure. Together, these two factors can increase tensions in the bilateral relationship.

Two, the Americans will be withdrawing from Afghanistan in 2014. This is a situation that could well lead to greater instability in the Af-Pak region. How China chooses to act in this situation will be crucial. Will China seek to manage the situation by a closer alliance with Pakistan or will it realize that the Pakistani security establishment is part of the problem? Remember, some of China’s problems in its Xinjiang province have their origins in Pakistan. Many of Xinjiang’s Islamic separatists have been trained in Pakistani madrassas and terrorist camps. Ultimately, Beijing must realize that cooperation with India will be necessary for any long-term and sustainable solution in the Af-Pak region.

Three, it is inevitable that China’s influence in South Asia will grow. Smaller countries such as Nepal, Bangladesh and Sri Lanka will, of course, increase their economic and political, and possibly even military, interactions with China; Bhutan might also establish formal diplomatic relations with China in the coming decade. This is not necessarily a zero-sum game for India or China or for any of the other countries involved. If India has not been able to help push rapid economic development in the rest of South Asia, it could probably achieve this together with China.

Four, China has ambitions of extending its maritime presence into the Indian Ocean in the coming years. China is already one of the world’s biggest ship-builders but its navy remains weaker than the Indian navy. In the coming decade though, the gap might close as the Chinese navy grows with the help of greater defence budget allocations. New Delhi might however, use the opportunity providing by the current gap in capabilities to develop a cooperative partnership with the Chinese navy in which the two navies can undertake joint exercises, disaster relief and so on.

While India must continue its own defence modernization and feel free to engage in partnership and cooperation with the United States and with China’s many neighbours, it must also simultaneously be willing to work with China’s leadership on a broad range of economic, political, military and social issues.  It is only a stable and prosperous China that will be a peaceful and friendly China. India can only gain from such a China.

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