A US-India-China Trilateral? Big Promise but Dim Prospects

(original text in English follows below the Hindi text)

पिछले महीने तीसरे इंडो-यूएस रणनीतिक वार्ता के बाद दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी सहायक विदेश मंत्री रॉबर्ट ब्लैक ने कहा, अमेरिका चीन और भारत के साथ एक त्रिपक्षीय वार्ता करना चाहता है ताकि अफगानिस्तान समेत तमाम दूसरे मुद्दों पर मिलकर काम हो सके। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय माहौल में यह देखने वाली बात होगी कि इस तरह की त्रिपक्षीय वार्ता की गुंजाइश बनती भी है या नहीं?

रूस, भारत और चीन के बीच त्रिपक्षीय वार्ता एक दशक से होती आ रही है। विदेश मंत्री और और सरकारों के प्रमुख के बीच इस आकांक्षा को ध्यान में रख कर बातचीत होती है कि विश्व व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित किया जाना है।

लेकिन रूस और भारत के चीन के प्रति संदेह की वजह से यह मंच सिर्फ बातचीत के फोरम तक ही सीमित है। मजेदार यह कि इस तिकड़ी के तीनों देशों मसलन चीन, रूस और भारत के अमेरिका से अपने संबंध है और यह उनके द्विपक्षीय रिश्तों के लिए उतना ही अहम भी है।

इस बीच, अमेरिका, भारत और जापान के बीच त्रिपक्षीय वार्ता ने पिछले साल शक्ल ले ली थी। हालांकि विचारधारा के अलावा भी तीनों लोकतंत्र को एक साथ एक मंच पर लाने में चीन का पड़ोसी होना महत्वपूर्ण था। तीनों देश इस वजह से राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति ज्यादा चिंतित हैं। यही चिंता भारत, जापान और अमेरिका को एक मंच पर ले आई है। बहरहाल यह फोरम किसी गहरे राजनीतिक उद्देश्य से नहीं बल्कि सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए खड़ा किया गया है। लेकिन इन दोनों त्रिपक्षीय फोरम की बुनियाद में खामिया हैं।

न तो रूस, भारत और चीन का त्रिपक्षीय फोरम अमेरिका की ओर से लिये जाने एकतरफा फैसले पर दबाव डाल सकता है और न ही अमेरिका भारत और जापान का कोई सैनिक कदम चीन की बढ़त को रोक सकता है। अब अमेरिका की ओर से भारत, अमेरिका और चीन के बीच त्रिपक्षीय वार्ता से जुड़ी अपील पर बात की जाए। इसमें कहा गया है कि यह फोरम अफगानिस्तान में मौजूदा हालात से पैदा मामलों को सुलझाने का एक मंच बनेगा। अमेरिका के लिए यह पहल साफ तौर पर अफगानिस्तान में सुरक्षा चिंताओं के हल के उद्देश्य से की गई है।

पाकिस्तान में अपना विश्वास खो बैठने के बाद उसके पास चीन और भारत ही सहयोगी की तरह सामने हैं। चीन पाकिस्तान को प्रभाव में ले सकता है। इसके साथ चीन के पास युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में रीस्ट्रक्चरिंग के काम में झोंकने के लिए काफी पैसा भी है। भारत के पास भी यह क्षमता है। वह भी अफगानिस्तान में बड़ा आर्थिक मोर्चा खोल सकता है। साथ ही आतंक के खिलाफ अभियान में अमेरिका का सहयोगी भी बना रह सकता है।

अब सवाल यह उठता है कि हितों के टकराव को देखते हुए (यहां अमेरिका और चीन का जिक्र भी हो रहा है) भारत और चीन इस त्रिस्तरीय फोरम में मिलकर कैसे काम करेंगे। भारत और चीन के हित सिर्फ पाकिस्तान या अफगानिस्तान तक ही सीमित नहीं है। यह त्रिपक्षीय फोरम भारत और चीन के बीच विश्वास बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है लेकिन यह निश्चित नहीं है कि इसमें अमेरिका की मौजूदगी मददगार साबित होगी या फिर चीन को यह अहसास दिलाएगी कि इसे किनारे किया जा रहा है।

अमेरिका और भारत चाहेंगे कि यह त्रिपक्षीय फोरम सिर्फ अफगानिस्तान के मसले पर ही काम करने तक सीमित न रहे। और यही वह बिंदु होगा, जहां चीन की ओर से अमेरिका का विरोध हो सकता है। दक्षिण एशिया का एक बड़ा खिलाड़ी होने की वजह से भारत को यहां के मामले में शामिल करना बात है लेकिन एशिया प्रशांत के मामलों से जुड़े त्रिपक्षीय वार्ता में भारत को शामिल करना अलग।

मसलन, चीन सोचता है कि एशिया प्रशांत के मामलों में भारत की कोई भूमिका नहीं बनती। वास्तव में चीनी विश्लेषक कमोबेश यह बात कह चुके हैं कि इस तरह के जी-3 से कोई मकसद पूरा नहीं होगा। इस समूह का जो उद्देश्य है, वह काम मौजूदा फोरमों के जरिये भी हो ही रहा है।

चीनी विश्लेषकों ने यह भी कहा है कि यह फोरम ऐसे मुद्दों को भी सुलझाना चाहता है, जिनमें इससे इतर दूसरी ताकतों की मौजूदगी भी जरूरी है। उदाहरण के लिए अफगानिस्तान मुद्दा सुलझाने के लिए, चीन पाकिस्तान को भी फोरम में शामिल करना चाहेगा। यह भी साफ है कि चीन भारत के साथ साझीदारी को ज्यादा उत्सुक नहीं है। दोनों भविष्य के प्रतिद्वंद्वी हैं और भारत दिनोदिन अमेरिका के नजदीक होते जा रहे हैं। इस बीच, भारत में एक वर्ग मान रहा है कि अमेरिका और चीन भारत के खिलाफ घेराबंदी कर सकते हैं।

भारत ने कुछ साल पहले उछाली गई जी-2 की अवधारणा को नहीं भुलाया है। इसके तहत दुनिया के मामलों पर चीन और अमेरिका का दखल सुनिश्चित किया जाना था। फिर भी मोटे तौर पर देखें तो भारत इस तरह के त्रिपक्षीय फोरम में दिलचस्पी दिखा रहा है क्यूंकि अमेरिका, चीन और भारत की तिकड़ी में सबसे कमजोर कड़ी भारत ही है। इस तरह का फोरम क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर सुरक्षा और रणनीतिक मसलों को कवर करते हैं और चीन के साथ इसे बराबरी का दर्जा देते हैं। जाहिर है चीन इसे पसंद नहीं करता।

लेकिन यह फोरम भारत को दक्षिण एशिया में अपनी सुरक्षा चिंताओं को दूर करने का मौका मुहैया कराता है। इसके साथ ही यह दक्षिण चीन सागर में भारत की भूमिका को भी मान्यता देता है, जहां उसकी उपस्थिति को भविष्य में चुनौती दी जा सकती है। बहरहाल, अमेरिका, भारत और चीन की त्रिपक्षीय वार्ता की संभावना बहुत दूर तक जाती नहीं दिखती क्योंकि हर देश के सामने सुरक्षा से जुड़े पुराने मुद्दे हैं।

आगे बढऩे का एक तरीका यह हो सकता है कि इसके तहत पहले से चले आ रहे सुरक्षा के मुद्दों को न छुआ जाए। बल्कि गैर पारंपरिक मुद्दों मसलन आपदा के समय राहत और मानवीय आधार पर सहायता कार्यक्रमों में मिलकर काम करने का इरादा जताया जाए। मानव तस्करी और किसी महामारी फैलने के समय में भी तीनों देश मिलकर काम कर सकते हैं। तीनों देश मिलकर कृषि में अगली पीढ़ी के प्रयोगों ओर ग्रीन टेक्नोलॉजी पर काम कर सकते हैं ताकि आगे बढ़ते शहरीकरण और इन्फ्रास्ट्रक्चर से पैदा जरूरतों को पूरी की जा सके।

फिलहाल , चीन में नेतृत्व के संक्रमण, अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव और भारत में कमजोर सरकार के इस दौर मे राजनीतिक तौर पर ऐसे साहसिक कदम उठाना जल्दबाजी होगी।

This is a slightly modified version of the translation published as: जबिन टी. जेकब, “एक मंच पर आएंगे भारत, अमेरिका और चीन?Business Bhaskar, 6 July 2012, p. 4.

(original text)

Following the 3rd Indo-US Strategic Dialogue last month, US Assistant Secretary of State for South and Central Asia, Robert Blake, stated that Washington had proposed to China a trilateral dialogue with India to explore how the three countries might work more closely together on matters of mutual interest such as Afghanistan.

However, how likely is such a trilateral in the present international context?

A Russia-India-China trilateral that has been taking place for over a decade, at the foreign ministers and heads-of-government levels, with ambitions of restructuring the international order. However, given Russian and Indian suspicions of China, the forum remains largely a talk-shop. What is more, for each of the three countries, their ties with the US – whom they seek to tie down in the process of reshaping the world order – remains by far the most important of their bilateral relationships.

Meanwhile, a new US-India-Japan trilateral dialogue took shape last year. However, as important as the ideological component should be, for these democracies in China’s neighbourhood, it is national security concerns about China that are the bigger driving force. Thus, this forum is currently more about military ties, rather than any deep political goals.

The fundamental bases of both trilateral forums are flawed. Neither is the Russia-India-China trilateral likely to impose any major constraints on unilateral American actions and nor can a military-dominated response by democracies be effective in managing the rise of China.

Coming back to the American call for a US-India-China trilateral, it was stated that this forum would aim at dealing with issues arising out of the present situation in Afghanistan. Clearly, then for the US, this is about managing a security situation. Having lost trust in Pakistan, it must involve other regional powers such as China and India. Beijing might able to influence Islamabad to behave itself and has the deep pockets necessary to fund reconstruction in the war-ravaged country. Similarly, India too, has the capacity to get involved economically in Afghanistan while at the same time being largely aligned with the US in the war on terror.

Nevertheless, the question then arises – how will this trilateral operate given a potential clash of interests between China and India (not to mention the US and China)? And these interests are not limited to just Pakistan or Afghanistan.

The trilateral could, of course, act as a confidence-building mechanism between New Delhi and Beijing but it is not clear if the US presence will help it along or cause the Chinese to feel that they are being cornered.

Washington, and possibly New Delhi, might see the US-India-China trilateral as having a wider coverage than just Afghanistan. And this is where the Chinese are likely to object to the US move. It is one thing to seek to involve India in South Asia, where it is obviously a major actor. But it is quite another to have to engage in trilateral dialogue with India on issues involving the Asia-Pacific, for example, where China thinks India has no role to play.

In fact, Chinese analysts have by and large, objected to the ‘G-3’ on the grounds that it serves no purpose that is not already served by existing groupings, or by saying that the issues it might seek to deal with are those that require the presence of other powers as well. For example, on Afghanistan, Beijing would prefer to have Pakistan also on board. It would appear that China is none too keen about sharing space with India that is both a potential future rival and getting increasingly closer to the US.

Meanwhile, sections in New Delhi too fear a ganging up of Beijing and Washington against India. It has not forgotten the idea of a ‘G-2’ floated some years ago under which the US and China would jointly manage world affairs. Overall however, India is likely to be interested in such a trilateral that covers security and strategic issues at the regional and global level because it gives it a degree of equality with the Chinese – precisely what Beijing might not want. A US-India-China trilateral allows India – the weakest of the powers – to address important security interests in South Asia as well as to have credibility in areas such as the South China Sea where its presence might be questioned.

All said, US-India-China trilateral dialogue is not likely to get very far given the dominance of traditional security considerations for each of the three countries. One way forward would be start a dialogue not with traditional security issues, but with non-traditional ones such as disaster relief and humanitarian assistance, and tackling human trafficking and the spread of diseases, and so on. The three sides could also get together to create the next generation of agricultural innovations and green technology and to deal with problems of increasing urbanization and infrastructure development in their countries.

For the moment, however, with the coming leadership transition in China, impending elections in the US and a weak government in India, it might be too early for such a bold political idea to be implemented.

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