Sino-Indian Cooperation: Will Oil Companies Show the Way?

(original version in English follows below Hindi text)

दक्षिण चीन सागर में स्प्रेटली और पारासेल द्वीप समूह पर कब्जे को लेकर चीन का अपने पड़ोसियों के साथ झगड़े के इस दौर में जो हलचल मची है उसमें भारत की क्या भूमिका रही है? भारत का मानना है यह विवाद शांतिपूर्ण बातचीत और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सुलझा लिया जाना चाहिए। लेकिन वास्तव में इसमें इसकी भूमिका किसी दर्शक से ज्यादा की है।

भारतीय तेल कंपनियां दक्षिण चीन सागर में 1980 के दशक   के उत्तराद्र्ध से ही सक्रिय रही हैं। वियतनाम की ओर से जारी किए गए ठेके हासिल करने के बाद भारतीय कंपनियां तेल उत्खनन और गैस उत्पादन में सक्रिय हैं। पिछले साल भी ओएनजीसी विदेश लिमिटेड (ओवीएल) और पेट्रोवियतनाम के बीच एक करार पर हस्ताक्षर हुआ। इस करार के तहत पूरे हाइड्रोकार्बन वैल्यू चेन पर दोनों का साथ मिलकर काम करने की योजना है।

इसके अलावा दोनों देशों ने भारत, वियतनाम के अलावा किसी तीसरे देश में भी तेल और गैस खनन परियोजनाओं के परिचालन, विस्तार और नए निवेश का भी फैसला किया है। लेकिन दक्षिण चीन सागर में एक उभरती हुई ताकत के तौर पर भारत की गतिविधियों पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी हैं। भारत का प्रतिद्वंद्वी चीन की निगाहें तो खास तौर पर भारत पर हैं।

चीन ने इस इलाके में अपने प्रतिद्वंद्वियों को तौलने की योजना बना रखी है और इस जून में इसी इरादे से उसने ऑफशोर ब्लॉक नं. 128 में तेल और गैस की खोज के लिए अंतरराष्ट्रीय बोली आमंत्रित की। जबकि वियतनाम की ओर से 2006 में लगाई गई ब्लॉक नं.128 की बोली प्रक्रिया भारत जीत चुका था। हालांकि ओवीएल ने समुद्र तल के पथरीला होने का हवाला देकर मई में यह ब्लॉक छोड़ दिया था।

कंपनी का कहना था सतह पथरीला होने की वजह से खुदाई मुश्किल है और परियोजना आर्थिक तौर पर फायदेमंद नहीं है।

ब्लॉक छोडऩे का ओवीएल का यह फैसला पूरी तरह से तकनीकी और कारोबारी पहलुओं को ध्यान में लेकर लिया गया था लेकिन इसका गहरा भू-राजनैतिक असर पडऩा लाजिमी था। खास कर वियतनाम, कंपनी के इस फैसले पर काफी विचलित था। वियतनाम चाहता था कि भारत दक्षिण चीन सागर में उठे विवाद को सुलझाने में बड़ी भूमिका अदा करे। यही वजह है कि पेट्रोवियतनाम ने ओवीएल के सामने इस इलाके में अगले दो साल सक्रिय रहने के लिए एक और आकर्षक पेशकश की। इस बीच, कंपनी के इस फैसले को भारतीय पेट्रोलियम और विदेश मंत्रालयों का भी समर्थन हासिल हुआ।

इस घटनाक्रम ने इस मामले को लेकर भारत की सक्रियता जाहिर कर दी और चीन के सामने भी यह साफ हो गया कि भारत जानबूझ कर चीन और पड़ोसियों के बीच चल रहे विवाद में हस्तक्षेप कर रहा है। हालांकि ओवीएल का मई में ब्लॉक. नं. 128 छोडऩे का फैसले का मतलब यह नहीं था कि इसने यह इलाका छोड़ दिया है। जबकि चीन का अंतराष्ट्रीय बोली आमंत्रित करने का मकसद वियतनाम और भारत दोनों की मंशा भांपना था।

भारत के लिए इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करना और उसके मुताबिक काम करना सही है। चीन इस इलाके पर दावा करते हुए ऐसा करने में नाकाम रहा है। भारत को इस बात पर खास ध्यान देना होगा कि वह यहां से क्या हासिल करने जा रहा है। उसके व्यवहार से वियतनाम को कहीं से यह नहीं लगना चाहिए कि वह पक्ष ले रहा है।

दूसरी ओर, वियतनाम के हाल के कदमों से लगता है कि वह चीन के साथ समझौता क रने के पक्ष में नहीं हैं। जून में वियतनाम की नेशनल असेंबली ने एक कानून पारित कर दक्षिण चीन सागर के इलाके पर अपनी संप्रभुता को मंजूरी दे दी। उन क्षेत्रों पर भी जिन पर चीन अपनी दावेदारी जता रहा है। वियतनाम के इस प्रस्ताव ने भारतीय संसद में 50 साल पहले पारित उस प्रस्ताव की याद दिला दी, जिसमें भारतीय सांसदों ने एक प्रस्ताव पारित कर 1962 के चीनी हमले में ली गई एक-एक ईंच जमीन वापस लेने की प्रतिबद्धता जताई थी।

इस तरह की प्रतिबद्धता के बावजूद भारत के लिए समय अब काफी बदल गया है। यही वजह है कि ओएनजीसी  ने चाइना नेशनल पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (सीएनपीसी) से एक समझौता किया है। दोनों कंपनियां मिल कर अन्य देशों में तेल और गैस परियोजनाओं के लिए बोली लगाएगी। इसके साथ ही दोनों मिल कर ओएनजीसी की घरेलू परियोजनाओं का दोहन और विकास करेंगी।

दोनों कंपनियों के लिए यह कारोबारी तौर पर फायदे का सौदा साबित होगा। जबकि प्रतिद्वंद्विता से तेल और अंतरराष्ट्रीय दाम में इजाफा ही होगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि ओवीएल और सीएनपीसी ने पहले भी मिलकर सूडान, सीरिया और म्यांमार में तेल और गैस खनन और उत्पादन की गतिविधियों को अंजाम दिया है। हालांकि दोनों की ओर से इस तरह का सहयोग या संयुक्त बोली इनके अलावा और कहीं नहीं दिखी है।

दरअसल ऊर्जा संसाधनों के लिए भारत और चीन के बीच की प्रतिस्पद्र्धा को चीन और भारत के तनाव की एक वजह माना जाता रहा है। देखा जाए तो ओएनजीसी की सब्सिडियरी ओवीएल और पेट्रोवियतनाम के बीच गठजोड़ का असर भी ओएनजीसी-सीएनपीसी सौदे पर पड़ सकता है। इस स्थिति में यह सवाल पैदा होता है कि क्या ओएनजीसी के साथ करार के तहत सीएनपीसी भारत के तेल और गैस संसाधनों को विकसित करने और उनमें उत्खनन का काम अपने हाथ में लेगी।

यह सब कुछ भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की मंजूरी पर निर्भर करेगा। हालांकि चीनी कंपनियों को इससे पहले इस तरह की क्लीयरेंस हासिल करने में खासी दिक्कतें आ चुकी हैं। भारत और चीन की कंपनियां तकनीकी और कारोबारी पहलुओं को देखते हुए आगे भी सहयोग का सौदा कर सकती हैं। लेकिन यह उनकी सरकारों पर निर्भर है कि वह इनके भू-राजनैतिक पहलुओं को देखते हुए ऐसे सौदों को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाएं या फिर इन्हें न होने दें।

क्या तेल कंपनियों की राह पर चलते हुए भारत और चीन दूसरे क्षेत्रों में भी सहयोग करना सीखेंगे। या फिर तेल कंपनियों की सहयोग की जद्दोजहद आने वाले दिनों में भारत और चीन के बीच तनाव की वजह बनेगा?

originally published as जबिन टी. जेकब, “तेल कंपनियां दिखाएंगी सहयोग का रास्ता?” Business Bhaskar, 7 August 2012, p. 4.

(original text)

Amidst the ongoing instability in the South China Sea, where China and its smaller neighbours are engaged in territorial disputes over the Spratly and Paracel groups of islands, what has been India’s role?

New Delhi’s position has been that the dispute ought to be resolved by these countries through peaceful negotiations and according to International law. But in reality, India is more than a bystander.

Indian oil companies have been active in the South China Sea since the late 1980s, exploring and producing gas, after having won Vietnamese bids. Last year, an agreement was signed between ONGC Videsh Limited (OVL) and PetroVietnam involving mutual cooperation along the entire value chain of the hydrocarbon industry, and the undertaking of new investments, expansion and operations of oil and gas exploration and production in Vietnam, India, and in third countries.

But as a rising international power, Indian activity in the area has come under greater international attention, especially from China.

In an attempt, no doubt, to test the will of its smaller Southeast Asian rivals, China last month announced that it was calling for international bids to explore the offshore Block 128 which in fact the OVL had won in a competitive bidding process called by Vietnam in 2006. OVL had however, earlier in May this year, decided to give up Block 128 because the seabed was rocky making drilling difficult and the project was not considered economically viable.

OVL’s decision was made on technical and commercial considerations but it also had geopolitical implications with the Vietnamese especially particularly upset with the move. Hanoi has wanted India to take on a greater role in solving the South China Sea disputes and so PetroVietnam, apparently made a new offer to OVL to entice it to stay on for another two years. Meanwhile, support for the move also came from India’s petroleum and foreign ministries.

Clearly, the sequence of events shows that the Indian government is taking a pro-active approach in the matter and China will no doubt feel justified in thinking that New Delhi is deliberately interfering in China’s disputes with its neighbours. Nevertheless, OVL’s May decision to exit Block 128 did not mean that it had in fact exited already and for China to announce the international bid could also be seen as testing not just Vietnam but India as well.

It is right for India to uphold and act according to international law in the region, something that China has failed to do in making its territorial claims. However, India must also be careful, about what it is getting into in the region. It must avoid giving the Vietnamese the impression that it can take sides in the dispute over and above supporting international law.

Recent Vietnamese actions in fact suggest that they are inclined to take a more uncompromising position with the Chinese. In late June, Vietnam’s National Assembly passed a law that effectively declared sovereignty over areas of the South China Sea, including territories claimed by China. That has some rather troubling resonance with another parliamentary resolution from 50 years ago. In November 1962, on the eve of the Chinese declaring a unilateral ceasefire, the Indian parliament had passed a unanimous resolution stating that India would recover every inch of territory lost to the Chinese.

Yet, New Delhi today clearly understands that the times have changed. In June, ONGC had in fact, also signed an agreement with the China National Petroleum Corporation (CNPC) to jointly bid for energy assets overseas with the Chinese company also possibly getting involved in developing and exploiting ONGC’s domestic assets.

For the two companies there are clear commercial benefits – rivalry between them only raises international prices for oil and gas. It must be noted however, that in an earlier arrangement, OVL and CNPC had collaborated in Sudan, Syria and Myanmar, in hydrocarbon exploration and production, but this did not grow into further cooperation or joint bidding elsewhere.

Indeed, competition for energy resources has been seen as one of the potential causes for future Sino-Indian tensions. And the fact that OVL, which is a ONGC subsidiary, has now entered into a fresh agreement with PetroVietnam, can possibly have consequences also for the ONGC-CNPC deal. Further, whether the CNPC will be able to take part in domestic exploration and development of India’s hydrocarbon resources as part of its deal with ONGC will depend on India’s security authorities giving the green signal. However, Chinese companies have in the past found it particularly difficult to obtain such clearances.

While the respective oil companies can go ahead and make deals on technical and commercial considerations, it is obvious that geopolitical considerations by their governments can also drive some of their deals or break them.

Can India and China learn to cooperate in other fields following in the path of their oil companies? Or are the travails of their oil companies an indicator of the difficulties ahead in Sino-Indian relations?

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