Candour on the Red Carpet: Parsing the Sino-Indian Joint Statement

Published as जबिन टी. जेकब, ‘चीनी पीएम की यात्रा पर संतुलित रुख’, Business Bhaskar, 22 May 2013, p.4.

(Original in English follows below Hindi text)

देश के पश्चिमी इलाके में मौजूद दपसांग में चीनी ‘घुसपैठ’ की वजह से तीन सप्ताह का गतिरोध खत्म होने के दो सप्ताह बाद चीन के प्रधानमंत्री ली खचियांग भारत की पहली आधिकारिक यात्रा पर यहां पहुंचे। पिछले दिनों की गतिविधियों पर नजर रखने वालों के सामने यह साफ हो गया है कि भारत न तो लद्दाख की घटना की वजह से अपनी जगह से उखड़़ा और न ही ली खचियांग की पहली आधिकारिक यात्रा के दिए गए संकेत से बहुत अधिक प्रभावित दिखा। भारत ने वही किया जो एक परिपक्व, आत्मविश्वास से भरी ताकत करती है।

राजनीतिक और आर्थिक लिहाज से देखें तो चीन के लिए ग्लोबल और स्थानीय स्तर पर अपने कदमों का कोई आकलन करना तब तक मुश्किल है जब तक कि वह यह न जान ले कि भारत अपने हितों को किस तरह देखता है और इसके मुताबिक क्या कदम उठा सकता है।

भारत को इसका अच्छी तरह अंदाजा है। भारत और चीन की सैन्य क्षमता में काफी अंतर है। सीमाई इलाके के फिजिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर में भी दोनों देशों के बीच बड़ा फासला है। इसके बावजूद भारत अपने रुख पर डटा रहा और उसने लद्दाख में यथास्थिति बनाए रखने पर अपना पक्ष मजबूती से रखा।

चीनी प्रधानमंत्री के साथ क्या बात हुई उसे लेकर भी मनमोहन सिंह मीडिया में दो टूक बोले। अमूमन वह ऐसा करते दिखते नहीं हैं। उन्होंने पश्चिमी सेक्टर की घटना का साफ जिक्र किया और दोनों के बीच इस तरह के मामलों से निपटने के लिए मौजूदा मैकेनिज्म की क्षमता का आकलन भी किया गया।

दोनों नेताओं की बैठक के बाद जो संयुक्त बयान जारी किया गया, उसमें विशेष प्रतिनिधियों के बारे में खासा हवाला दिया गया । दोनों ओर के विशेष प्रतिनिधि राजनैतिक पैमानों और नीति-निर्देशक सिद्धांतों के आधार पर हुए 2005 के समझौते के ढांचे के तहत आगे की बातचीत करेंगे। इससे कुछ भारतीय विश्लेषकों की यह आशंका खत्म हो जानी चाहिए कि चीन 2005 के समझौते की अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे हट सकता है।

यहां इस बात पर भी गौर करना जरूरी है कि सीमा पर रक्षा सहयोग से जुड़े समझौते पर चीन की ओर से साफ तौर पर जोर डालने के बावजूद इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई। चीन में भारत के राजदूत इसका खुलासा कर चुके हैं। इसका मतलब यह है कि भारत बगैर असर के अध्ययन के ऐसे किसी समझौते पर दस्तख्त करने की जल्दी में नहीं है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बातचीत के दौरान चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे के मामले को उठाया और चीनी बाजारों में भारतीय कंपनियों की पहुंच बढ़ाने की इजाजत देने को कहा। हालांकि उन्होंने यह जरूर माना कि भारतीय इन्फ्रास्ट्रक्चर और मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को चीनी निवेश की जरूरत है। व्यापार घाटे को घटाने के लिए यह जरूरी कदम है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक विकास के इस मामले को सिर्फ भारत और चीन तक ही सीमित नहीं किया जा रहा है। बल्कि इसमें तीसरे पक्ष को भी जोडऩे की बात की जा रही है। बांग्लादेश-चीन-भारत और म्यांमार ढांचे के तहत बहुस्तरीय सहयोग पर जोर दिया जा रहा है।

दोनों नेताओं के संयुक्त बयान में और भी कई नए विचारों को जगह दी गई है। पहली संयुक्त सीईओ फोरम की बैठक के साथ मिलजुलकर इंडस्ट्रियल जोन भी स्थापित करने का प्रस्ताव है। इन औद्योगिक जोनों में दोनों देशों के उद्योग आपसी सहयोग से काम करेंगे और आगे बढ़ेंगे।
इस तरह दोनों देशों के शहरों और प्रांतों के बीच भी निकट संपर्क स्थापित करने की पहल आर्थिक विकास और सहयोग को एक नया रचनात्मक पहलू मुहैया कराएगी। भारत और चीन की अर्थव्यवस्था और आबादी को देखते हुए इस तरह का विकेंद्रित आर्थिक नजरिया जरूरी है। यह भविष्य में सहयोग की दिशा हो सकती है।

भारत और चीन के बीच आर्थिक और राजनीतिक सहयोग की राह में दोनों की ओर से किसी तीसरे देश की विकास परियोजनाओं में मिलकर काम करने की संभावना छिपी है। ये देश दोनों के पड़ोस में हो सकते हैं। इनमें अफगानिस्तान, म्यांमार, नेपाल और मध्य एशियाई गणराज्य शामिल हो सकते हैं। संयुक्त बयान में अफगानिस्तान का खास तौर से जिक्र किया गया है। इससे दोनों देशों की सुरक्षा परिदृश्य में अफगानिस्तान का महत्व साबित हो जाता है।

संयुक्त बयान में सहयोग के उन बिंदुओं का जिक्र किया गया है जो पहले भी समझौता पत्रों में आ चुके हैं। भारतीय प्रधानमंत्री ने दोनों देश के बीच बहने वाली नदियों के ऊपरी सिरों पर होने वाले चीनी निर्माण के नतीजों के बारे में चिंता व्यक्त की। इस बारे में उन्होंने मीडिया को साफ तौर पर जानकारी दी। लेकिन चीनी प्रधानमंत्री को यह सूचना देने के बावजूद उनकी ओर से कोई खास प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई।

बाढ़ के समय ब्रह्मपुत्र नदी की धारा के बारे में जानकारी देने संबंधी समझौता भी 2005 में हुए एक ऐसे ही समझौते का अगला कदम है। दोनों देशों के बीच होने वाले समझौतों में वैज्ञानिक, तकनीकी और औद्योगिक सहयोग की बात की जाती रही है लेकिन अब तक इस दिशा में बहुत कम प्रगति हुई है और इसका भी नतीजा निकलना अभी बाकी है। भारत और चीन के बीच अक्षय ऊर्जा और हाईटेक सेक्टर में सहयोग पर जोर दिया जाता रहा है लेकिन अक्षय ऊर्जा और हाईटेक सेक्टर में दोनों देशों के बीच सहयोग की दिशा में पहलकदमी बेहद कम रही है।
इसी तरह दोनों ओर के आम लोगों को बीच संपर्क बढ़ाने के मामले में नतीजे निराशाजनक ही हैं। छात्रवृतियों और विद्वानों के आदान-प्रदान को बढ़ाने को लेकर कोई बड़ी प्रतिबद्धता जाहिर नहीं की गई है।

दोनों देशों के बीच इस तरह की गतिविधियां बेहद कम है। भारत में चीनी भाषा को सिखाने के मामले में भी मजबूत प्रतिबद्धता नहीं दिखती। भारत में यह काम चीनी सरकार की अहम एजेंसियों के खास समर्थन के बिना संभव नहीं है। अगर ये एजेंसियां जोर दें तो चीनी भाषा को सीखने की रफ्तार तेज हो सकती है।

दोनों देशों के पत्रकारों का एक दूसरे के यहां आने-जाने को भी प्राथमिकता देने का जिक्र इस संयुक्त बयान में किया गया है ताकि आपसी समझदारी बढ़े। यह काफी अहम है कि दोनों ओर के जूनियर और मझोले स्तर के नौकरशाहों और सैन्य अफसरों के बीच अक्सर बातचीत होती रहे। ऐसे लोगों के कैरियर की शुरुआत में इस तरह का सहयोग बढ़ाने और परिचय बढ़ाने की प्रवृति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

 

Chinese Premier Li Keqiang arrived in New Delhi on his first official visit overseas, barely two weeks after the end of a three-week long standoff over a Chinese ‘incursion’ in the Depsang Plains in the Western Sector of the boundary dispute. To the careful observer, it is clear that the Indian government was neither thrown off its stride by the Ladakh incident and nor was it overly swayed by the symbolism of Li Keqiang’s first state visit. And that is exactly how mature, self-confident powers act. Politically and economically, it is impossible for China to make its calculations at the global and regional levels without also taking into account how India perceives its interests and how it will act. And New Delhi is well aware of this.

Despite the obvious differences in military capacity and in terms of physical infrastructure in the border areas, the Indian government did not budge from its position that the status quo ante had to be restored in Ladakh. Similarly, Prime Minister Manmohan Singh was unusually candid in his remarks to the media about what transpired at his meeting with the Chinese Premier. Singh made a direct reference to the incident in the Western Sector and to the fact the efficacy of existing mechanisms to deal with such incidents was assessed.

The Joint Statement released at the end of the meeting of the two leaders makes specific reference to the Special Representatives carrying forward their negotiations under the framework of the 2005 Agreement on Political Parameters and Guiding Principles. This should allay somewhat the concerns that many Indian analysts have expressed about China reneging on its commitment to the 2005 Agreement. It is also noteworthy that despite the Chinese apparently pushing hard for a Border Defence Cooperation Agreement, the matter was not discussed at all according to the Indian ambassador to China. This shows that New Delhi refused to be rushed into signing an agreement without considering carefully all the ramifications.

Prime Minister Singh also reiterated Indian concerns about the burgeoning trade deficit with China calling for greater access for Indian companies to the Chinese market. At the same time, he was ready to acknowledge the need for Chinese investments in India’s infrastructure and manufacturing sectors, as a necessary part of reducing the trade deficit. Further, such focus on infrastructure and economic development is not limited to the bilateral plane but also extends to the multilateral level under the BCIM (Bangladesh-China-India-Myanmar) framework.

Other new ideas have found mention in the Joint Statement. Besides the holding of the first joint CEOs forum, there is also a proposal for developing industrial zones where enterprises of the two countries can come together to cooperate and grow. Similarly, the idea to have cities and states/provinces in the two countries building direct links with each other allows greater initiative and potentially more creative approaches to economic development and collaboration. This sort of decentralized approach to bilateral economic relations between the two countries is essential given the sizes of their economies and populations and, is the way of the future.

India-China Ties: a multi-hued relationship
India-China ties: a multi-hued relationship

Possibilities for economic and political cooperation come together in the call for India and China to cooperate on development projects in third countries. The obvious candidates will be in their own immediate neighbourhood and could potentially include Afghanistan, Myanmar, Nepal and the Central Asian Republics. Afghanistan, in fact, finds specific mention in the Joint Statement, testifying to its importance in the security calculus of both countries.

Meanwhile, there are also areas in the Joint Statement that appear to cover some of the same ground covered by previous statements and MoUs or marking what might only be incremental progress. While the Indian Prime Minister was forthright during the media briefing, on India’s concerns about the consequences of China’s construction activities in the upper reaches of rivers shared by the two countries, he was not able to get a specific commitment from the Chinese on giving such information. The MoU on provision of hydrological information of the Brahmaputra in the flood season appears only a small step forward from a similar MoU of 2005.

While scientific, technological and industrial cooperation has long been talked about in various bilateral MoUs, there seem very little results to show still, especially in the crucial renewable energy and high-tech sectors.

Similarly, despite the talk of the importance of people-to-people contacts, it is also disappointing that there is not greater commitment to increasing the number of scholarships and scholar exchanges between the two countries from their current abysmal levels. There is also less than a fulsome commitment to the expansion of Chinese language learning in India, which cannot take place without considerable support from Chinese government agencies.

While there is a specific call in the Joint Statement for media exchanges to improve mutual understanding between the two peoples, it is just as crucial that there are also more frequent and sustained interactions between junior- and middle-level bureaucrats and military officials. This is essential to build familiarity and habits of cooperation between the two countries from an early stage of the careers of their officials.

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