Li Keqiang’s India Visit: Towards Realistic Expectations

(The English version was written on the first day of the Chinese Premier’s visit to India and updated and published originally as जबिन टी. जैकब, ‘भरोसा बढ़ाने वाली भेंट’, Dainik Jagran, 22 May 2013, p. 10 (see below).)

Chinese Premier Li Keqiang is in India on his first overseas visit since taking over his new position in March. The visit is notable for a number of reasons.

One, it came against the backdrop of the recent Chinese ‘incursion’ in the Ladakh region and the resultant stand-off that lasted three weeks. As a result, the mood could have be decidedly indifferent if not unfriendly in terms of the public reception of Li in India.

In the case of high-level visits, however, no matter what the problems and complications in a bilateral relationship, it is always important from a diplomatic point of view to make sure the atmospherics are excellent and that warmth and enthusiasm are on full display.

In a television interview on the eve of Chinese President Hu Jintao’s visit to New Delhi in 2006, the then Chinese Ambassador to India happened to state that Arunachal was a part of China. The press went to town with what was a fairly innocuous statement – the ambassador was after all, only doing his job – and this resulted in President Hu receiving a rather cold reception in New Delhi.

However, especially where visitors from East Asia are concerned, form and symbolism are often as important as the substance itself. It is therefore, a good sign that in addition to laying out the red carpet, there are also plans by the Indian Prime Minister Manmohan Singh to host his Chinese counterpart for a dinner at his residence with top Indian political functionaries.

The second notable aspect of this visit is that Premier Li is breaking protocol by coming here when it was in fact the Indian Prime Minister’s turn to visit China. It is believed that Li himself insisted that India would be his first destination abroad after taking office. By deciding so, he was making the point that India was an important partner for China.

What is more, he overruled other objections from his foreign policy establishment that had pointed out that summer in Delhi was not a good time for an official visit and that the Indian government was buffeted by political problems and moreover, in its last year of office.

The symbolism of Li’s decision is thus, all the more significant. Further, in a meeting with a youth delegation from India, last week, Li recalled his first visit to India 27 years ago and the positive impressions he had gathered from that visit. It is therefore, important that the Indian government focuses on the positives and seeks to build a positive relationship with a powerful Chinese leader who is likely to be in the saddle for the next decade.

Naturally, the question arises why then if the visit was so significant and loaded with symbolism did the ‘incursion’ in Ladakh take place? The incursion in the form of Chinese soldiers camping at a significant distance inside India’s perception of the Line of Actual Control (LAC) and the resulting three-week standoff were quite extraordinary events – compared to other incursions reported so far in the public domain – and took plenty of skillful diplomacy and manoeuvering  to bring to an end.

Whatever the reason, it must be understood that it is the business of governments to employ multiple prongs of engagement at the same time when dealing with another country. And if that country is a near neighbour, it is inevitable that there will be conflicts of interest as is the case with China and India. But the fact that they are neighbours is also why there are just as important reasons to find ways to cooperate and to maintain the peace.

While the Ladakh incursion was possibly one prong of the Chinese engagement with India, the Chinese desire to cooperate economically with India is just as serious an approach. Indeed, it is the Indian Prime Minister himself who is on record stating that in the case of the Sino-Indian bilateral relationship, both competition and cooperation are possible.

This is the new reality that the government and the people of India must accept. As long as the boundary dispute remains unresolved, India must expect ‘incursions’ to continue and even lengthy stand-offs like in the recent case in Ladakh. This in effect places another important item on the agenda during the Chinese Premier’s visit – the improvement of current military confidence-building measures, including communications, between the military and diplomatic establishments of the two countries.

Meanwhile, economic linkages must continue apace. The trade deficit is something that India is concerned about but this could be addressed by opening up to Chinese investments in the infrastructure and manufacturing sectors. While it might be too early for India to accept the Chinese proposal for a free trade agreement with India, their proposal for an industrial cluster where their companies could focus their investments in is worth pursuing. No doubt, the Chinese have picked up the idea from the Delhi-Mumbai Industrial Corridor that is currently underway with Japanese support.

Broad political and economic concerns apart, more attention must be focused on developing people-to-people relations. The exchange of students, scholars, scientists, journalists, and of junior- and middle-level bureaucrats and military officials, between China and India must be increased a hundred-fold over current numbers. This would go a long way in allaying popular misperceptions about each other.

(Hindi version)

चीन के प्रधानमंत्री ली कछ्यांग की भारत यात्रा ने दोनों देशों के साथ-साथ दुनिया का ध्यान भी खींचा। इसलिए और भी अधिक, क्योंकि उनकी यह यात्रा लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ और इसके चलते द्विपक्षीय रिश्तों में आए ठहराव की पृष्ठभूमि में हुई। ली कछ्यांग नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात के बाद मुंबई गए। भले ही दोनों देश सीमा विवाद के बेहद जटिल मुद्दे के समाधान की दिशा में बहुत आगे तक न जा सके हों, लेकिन यह ध्यान देने लायक है कि खुद ली ने अपनी इस यात्रा को द्विपक्षीय रिश्तों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया और अनेक क्षेत्रों में परस्पर सहयोग का अपने स्तर पर संकल्प भी व्यक्त किया।

सीमा विवाद जैसे मुद्दों का रातोंरात समाधान होता भी नहीं है। फिर भी इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि चीन ने अपनी ओर से पर्याप्त संकेत दिए कि वह भारत के साथ मजबूत संबंधों का पक्षधर है। इसका संकेत इससे भी मिलता है कि मनमोहन सिंह और ली कछ्यांग की मुलाकात के बाद दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग के आठ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। यह अनायास नहीं है कि ली कछ्यांग ने अपनी भारत यात्रा को अत्यधिक महत्व दिया और यह कहने में भी हिचक नहीं दिखाई कि वह नई दिल्ली में अपने घर जैसा अनुभव कर रहे हैं। यह इसका स्पष्ट संकेत है कि चीन नई दिल्ली से किस तरह की अपेक्षाएं कर रहा है। चीन के साथ संबंधों के मामले में अविश्वास की पूरी गुंजाइश है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि ली कछ्यांग ने अपेक्षाओं से अधिक निकटता प्रदर्शित की।

ली की भारत यात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उन्होंने तब भारत आने का फैसला किया जब प्रोटोकाल के अनुसार बारी मनमोहन सिंह के बीजिंग जाने की थी। यह माना जाता है कि ली ने खुद इस पर जोर दिया कि वह प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहली विदेश यात्रा में भारत जाना चाहते हैं। अपने इस फैसले के कारण उन्होंने यह संदेश दिया कि वह भारत को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश के रूप में देखते हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने विदेश नीति प्रतिष्ठान की इन आपत्तिायों को खारिज कर दिया कि नई दिल्ली में गर्मी का मौसम उनकी आधिकारिक भारत यात्रा के लिए ठीक नहीं है और भारत सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम वर्ष में गंभीर राजनीतिक समस्याओं का सामना कर रही है। स्पष्ट है कि ली की भारत यात्रा का संदेश कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। कोई भी यह सवाल उठा सकता है कि जब चीन के प्रधानमंत्री अपनी भारत यात्रा को इतना महत्वपूर्ण मान रहे थे तो लद्दाख में चीनी घुसपैठ की घटना क्यों हुई?

Art in Construction, Beijing
Art in Construction, Beijing

इस घटना का कारण जो भी हो, यह समझा जाना चाहिए कि यह सरकारों का काम है कि वे किसी देश के साथ संबंधों के मामले में कई स्तरों पर संपर्क कायम करने के प्रयास करें और अगर वह देश पड़ोसी है तो दोनों देशों के बीच हितों का टकराव अवश्यंभावी हो जाता है। चीन और भारत का मामला ऐसा ही है। लेकिन यह तथ्य कि वे आपस में पड़ोसी हैं इस जरूरत को भी रेखांकित करता है कि उन्हें सहयोग के रास्ते तलाशने ही होंगे और शांति कायम रखनी होगी। लद्दाख में जो कुछ हुआ वह भारत के साथ निपटने की चीन की एक रणनीति थी और नई दिल्ली के साथ आर्थिक सहयोग की इच्छा व्यक्त करना बीजिंग की अलग नीति है। दोनों को अलग-अलग रूप में देखने की जरूरत है। सच तो यह है कि भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद यह कहा है कि जहां तक चीन और भारत के संबंधों का प्रश्न है तो दोनों देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा, दोनों संभव है। यह एक नई सच्चाई है जो भारत सरकार और यहां के लोगों को स्वीकार करनी होगी। जब तक दोनों देशों के बीच सीमा विवाद लंबित है तब तक भारत को घुसपैठ की घटनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसी घटनाओं के चलते लंबी अवधि के गतिरोध भी पैदा हो सकते हैं। लद्दाख में यही देखने को मिला।

यह अच्छी बात है कि दोनों देश आर्थिक संबंधों में और अधिक निकटता लाने का संकल्प व्यक्त कर रहे हैं। इस मामले में यह भी उल्लेखनीय है कि व्यापार घाटे के सिलसिले में चीन ने भारत की चिंताओं को समझा। व्यापार घाटे पर भारत की चिंताएं जायज हैं, लेकिन इस चिंता का समाधान तभी हो सकता है जब भारत और अधिक चीनी निवेश के लिए आगे आए। खासकर बुनियादी ढांचे और उत्पादन के क्षेत्रों में चीनी निवेश बढ़ाने की अच्छी-खासी संभावनाएं मौजूद हैं। भारत के लिए फिलहाल मुक्त व्यापार समझौते के चीन के प्रस्ताव को स्वीकार करना जल्दबाजी नही है, लेकिन कुछ अन्य आर्थिक सहयोग के क्षेत्रों पर तत्काल प्रभाव से ध्यान दिया जा सकता है। यह गौर करने लायक है कि चीन ने दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कोरिडोर पर निगाह डाली है जिसे जापान के सहयोग से पूरा किया जा रहा है।

चीन के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा में अनेक सकारात्मक संकेत छिपे हैं। अब दोनों देशों को व्यापक राजनीतिक और आर्थिक संपकरें के साथ-साथ व्यक्ति के व्यक्ति से संपर्क को विकसित करने पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। छात्रों, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, पत्रकारों और जूनियर तथा मध्यम स्तर के नौकरशाहों के एक-दूसरे के देशों में आने-जाने पर नए सिरे से ध्यान देने की आवश्यकता है। इससे दोनों देशों की जनता के बीच अविश्वास की जो भावना कायम है उसे दूर करने में मदद मिलेगी।

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