The BRICS Challenge: Converting Rhetoric to Leadership

Originally published: जबिन टी. जेकब, “सिर्फ बयानों से नहीं बढ़ेगा ब्रिक्स का वर्चस्व,” Business Bhaskar, 5 April 2012, p. 4.
(original text in English follows below the Hindi text)

क्या ग्लोबल इकोनॉमी में ब्रिक्स एक असरदार, संगठित और नेतृत्वकारी आवाज बन कर उभर सकता है? क्या ब्रिक्स देशों का एक साथ खड़ा होना क्या पश्चिमी वर्चस्व वाली मौजूदा विश्व व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है? लेकिन दिल्ली में हाल में समाप्त हुए चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इन बड़े सवालों का कोई जवाब नहीं मिलता।

आर्थिक दायरे में तो ब्रिक्स देश पश्चिम के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। पश्चिमी देशों खास कर यूरो जोन में जारी आर्थिक संकट के इस दौर में ऐसा संभव है। दिल्ली घोषणा पत्र में तो पश्चिमी देशों को नसीहत भी दी गई कि वे मैक्रो इकोनॉमी और वित्तीय नीति के मोर्चे पर जिम्मेदारी का परिचय दें। इन देशों से साफ-साफ कहा गया कि उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था में ढांचागत सुधार करने होंगे।

लेकिन सिर्फ बयान देने भर से विश्व व्यवस्था का नेतृत्व आपके हाथ में नहीं आ जाएगा। ग्लोबल संस्थाओं खासकर आर्थिक मामलों से जुड़ी संस्थाओं पर पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने के अपने घोषित मंसूबों के बावजूद ब्रिक्स देश पिछले साल आईएमएफ के अध्यक्ष पद के लिए सर्वसम्मति से कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं कर सके। वल्र्ड बैंक के प्रेसिडेंट पद के लिए उम्मीदवार चुनने के मामले में भी ऐसा ही हुआ।

ब्रिक्स देशों ने भले ही पश्चिमी देशों की तुलना में आर्थिक संकट का सामना बेहतर ढंग से किया हो लेकिन ये भी गंभीर अंदरुनी आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। ब्रिक्स देश अपनी अंदरुनी चुनौतियों से जूझ रहे हों लेकिन उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी आर्थिक तरक्की का फायदा पड़ोसियों और उन देशों को भी मिले जो उनकी भौगोलिक मौजूदगी के दायरे में हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ब्रिक्स देशों को यह समझना जरूरी है कि उन पर सिर्फ मौजूदा विश्व व्यवस्था में पश्चिमी वर्चस्व को ही चुनौती देने की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि उन्हें अंदरुनी अर्थव्यवस्था की दिक्कतों से जूझना और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को भी बढाऩा है।

ब्रिक्स देशों के बीच राजनीतिक विचारधाराओं का अंतर भी इस समूह की एक बड़ी कमजोरी बन कर उभरती है, खास कर तब जब विचारधारा के तौर पर ज्यादा संगठित पश्चिमी देशों से इसकी तुलना की जाती है। इसके अलावा ब्रिक्स देशों में सैन्य और सामरिक मोर्चे पर आपसी अविश्वास भी है। ब्रिक्स के आलोचक जब चीन और भारत के बीच सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हैं तो वे सही सवाल उठा रहे होते हैं।

इसी तरह मध्य एशिया या साझा सीमा पर चीन के इरादों पर रूस की शक भरी निगाह भी आपसी विश्वास की कमी को ही दिखाता है। ऐसे हालात में यह भी तय नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की उम्मीदवारी को समर्थन देंगे भी या नहीं।

कुछ ब्रिक्स देशों ने लीबिया, सीरिया और श्रीलंका के मामले में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अलग-अलग ढंग से वोटिंग की है। इससे भी उनके रुख में सहमति का अभाव झलकता है। फिर भी यह माना जा सकता है कि व्यावहारिक सहयोग के मामलों में ब्रिक्स देश अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं। लेकिन सामूहिक तौर पर ये एक राजनीतिक और आर्थिक ताकत है और दुनिया में बेहतरी के वाहक बन सकते हैं।

ब्रिक्स देशों के दिल्ली घोषणा-पत्र में आईएमएफ और वल्र्ड बैंक में कोटा और गवर्नेंस में सुधार पर दबाव बनाने का लक्ष्य बनाया गया है। इसके लिए एक डेडलाइन तय की गई है। एक तरह से यह एक मजबूत राजनीतिक रुख है। दिल्ली सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स देशों का आपसी मुद्रा में कारोबार करने और संयुक्त विकास बैंक की स्थापना का एजेंडा भी इतना ही अहम कदम है।

इसमें से पहला कदम ब्रिक्स देशों में कारोबार कर रही कंपनियों में दिलचस्पी जगा सकता है। ऐसा होने पर कंपनियां एक दूसरे के बाजार को गंभीरता से लेंगी और पश्चिमी देशों के विकल्प के तौर पर इसे अपनाएंगी। ब्रिक्स देशों के बीच कारोबार, निवेश और वित्तीय संबंध बढऩे के साथ ही इनका आर्थिक कद भी ऊंचा होगा।

अगर यह समूह मिल कर काम करता है तो यह राजनीतिक बढ़त भी हासिल कर सकता है। इस बीच, ब्रिक्स देशों को विकासशील देशों की चिंताओं और प्राथमिकताओं के बारे में संजीदा दिखना होगा। खास कर इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास, एसएमई, कृषि, ग्रीन एनर्जी और बढ़ते शहरीकरण की चुनौतियों के संदर्भ में।

आखिर दुनिया में अपना वर्चस्व कायम करने की पश्चिम की क्षमता कैसे बढ़ी? इन देशों के लोगों के बीच बहुआयामी और लगातार संपर्क का एक लंबा इतिहास रहा है। चाहे युद्ध का समय हो या शांति का दौर, पश्चिमी देशों के लोगों ने आपसी संपर्क के जरिये एक दूसरे और उनके कामकाज के तौर-तरीकों के प्रति भी अच्छी समझ विकसित कर ली है।

लेकिन जहां तक ब्रिक्स देशों का सवाल है तो भौगोलिक दूरी ने मानसिक दूरियां भी बना ली हैं। भारत और चीन के बीच संपर्क और व्यवहार का एक समृद्ध इतिहास रहा है। लेकिन आज की तारीख में यह गायब हो चुका है या फिर पश्चिमी उपनिवेशवाद और शीत युद्ध के दौरान इनके संबंधों में टकराव के हालात पैदा हो गए।

बहरहाल ब्रिक्स देशों को एक दूसरे को समझने की अपनी नाकामी दूर करनी होगी। यह कमी उनके नागरिकों में भी है। अगर इस समूह को आगे में लंबे समय तक बरकरार रहना है तो यह करना ही होगा। इस समय ब्रिक्स देशों में सरकारों के प्रमुखों, मंत्रियों और वरिष्ठ नौकरशाहों के बीच ही मिलना-जुलना या विचारों का आदान-प्रदान होता है।

लेकिन अब राजनीतिक नेताओं और ब्यूरोक्रेसी में निचले स्तर पर सहयोग और वार्ता की जरूरत है। ये वे लोग हैं जो अगले बीस साल में अपने-अपने देश में इन क्षेत्रों में नेतृत्व संभालेंगे। इस तरह का सहयोग वैज्ञानिकों, कारोबारियों, बौद्धिकों और आम नागिरकों के बीच स्थापित और विकसित करना होगा। इस तरह से ही वह एक दूसरे के प्रति अज्ञानता, डर और बनी-बनाई छवि से उबर सकेंगे।

ब्रिक्स देशों ने दिल्ली घोषणा पत्र में कई क्षेत्रों में सहयोग का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। मसलन वैज्ञानिक शोध और विकास से लेकर शहरों और स्थानीय सरकारों के बीच सहयोग तक। अगर यह लक्ष्य पूरा हो सका तो ये देश काफी हद तक ग्लोबल विकास में योगदान भी दे सकेंगे और अपने लिए राजनीतिक पूंजी भी इकट्ठा कर सकेंगे।

(original text)

Can the BRICS really be an effective, united and leading voice in the global economy? Is the BRICS grouping a challenge to the existing Western-dominated global order? The Fourth BRICS Summit that concluded in Delhi last week has not quite answered these larger questions.

It is in the economic realm, that the BRICS nations can currently pose the biggest challenge to the West. This is especially so given the continuing air of crisis that hangs over Western economies, particularly the eurozone. The Delhi Declaration practically scolded the West when it asked “advanced economies to adopt responsible macroeconomic and financial policies” and to “undertake structural reforms.”

But rhetoric does not equal leadership. Despite their declared intention to counter Western domination of global institutions, particularly economic ones, the BRICS failed to put up a united candidate for the job of IMF President last year, and they might still fail to do so for the post of the World Bank President later this year.

The BRICS economies might have weathered the economic crisis somewhat better than Western economies but they still have serious internal economic difficulties. At the same time, even as they deal with internal challenges, the BRICS also have to ensure that their own economic growth can create spillover effects for their neighbours and the wider regions in which they are each located. In other words, the BRICS will need to acknowledge that they have as important internal and regional economic responsibilities than just countering global Western domination.

The differences in political ideology among the BRICS nations form another substantial weakness of the grouping when compared to the more ideologically united West. Add to this, the military and strategic suspicions between some BRICS members. The critics have a point when they highlight the Sino-Indian boundary dispute or Russian suspicions of Chinese intentions in Central Asia and elsewhere along their common borders. It is far from clear also if China and Russia will support without conditions, the candidature of India, Brazil and South Africa to permanent seats on the UN Security Council. And some BRICS countries have often voted differently from each other on a series of important UN Security Council votes in the last year over Libya, Syria and Sri Lanka. There is therefore, a long way to go before the BRICS can begin to challenge the West’s political domination, if ever.

Nevertheless, it must be acknowledged that the BRICS are on a learning curve as far as practical cooperation is concerned and that they represent a collective economic and political heft that can potentially bring about great changes for the global good.

The Delhi Declaration for example, has targeted the IMF and World Bank for reforms of their quota and governance systems putting down specific deadlines by when these tasks should be accomplished – also a strong political statement. The two Delhi pacts on trade in the BRICS local currencies and the decision to study the setting up of a joint development bank are similarly important decisions.

The first decision can build up interest in BRICS companies to do business with each other and to consider each other’s markets more seriously as alternatives or additions to doing business in Western economies with which each of the BRICS continues to have their most important economic relationships. The increased density of intra-BRICS trade, investment and financial ties will give greater economic weight to the grouping as well as more political incentives for the group to work together.

Meanwhile, a BRICS bank will certainly be more sensitive to developing country concerns and priorities such as infrastructure development, small and medium enterprises (SMEs), agriculture, green energy, and dealing with the challenges of rapid urbanization.

The West’s capacity for world domination is built on a long history of multidimensional and frequent contact among its own peoples. Through war and peace, Westerners have developed a great deal of understanding and experience of each other and habits of working together. Among the BRICS nations however, geographical distance has also meant mental distance. While China and India had a rich past of contact and interactions most of these disappeared or turned confrontational during the course of Western colonialism and the Cold War.

The BRICS will therefore have to overcome the lack of general understanding of each other that exists among their citizens, if the grouping is to really become sustainable over the long term. So far BRICS interactions are more or less limited to the heads of government and at the ministerial and senior bureaucratic levels. But practices of dialogue and cooperation must be developed from the lower and middle levels of political leaders and bureaucracy – these are the people who are going to be in charge of their respective countries in about 20 years time. Similarly, such cooperation has to be developed and sustained among scientists, businessmen and scholars and regular citizens of BRICS nations who have to get rid of their ignorance, fears and stereotypes of each other.

The BRICS nations have in the Delhi Declaration, outlined ambitious goals in these respects such as to undertake joint scientific research and development and to build cooperation between their cities and local governments. If they can fulfill this agenda, they will have contributed substantially to both global development and building up political capital for themselves.


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