3rd Plenum, 18th CC: A Reformist Agenda but Challenges Ahead

First published as जेबीन टी जैकब, ‘सीपीसी के विरोधाभासी संदेशों का बंडल’, Business Bhaskar (New Delhi), 28 November 2013, p. 4.

 

(Original text in English follows below)

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) की 18 वीं सेंट्रल कमिटी की तीसरी प्लेनरी (विशेषाधिकार प्राप्त महत्वपूर्ण और वरिष्ठ सदस्यों की सभा) इस महीने आयोजित हुई। इस प्लीनम (महासभा) में सेंट्रल कमिटी के 205  सदस्यों के अलावा 171 अन्य सदस्य होते हैं जो महत्वपूर्ण नीतिगत मसलों पर चर्चा कर किसी नतीजे पर पहुंचते हैं। किसी भी सेंट्रल कमिटी की तीसरी प्लीनम का महत्व इसलिए है कि नया नेतृत्व प्राय: इसका उपयोग अपनी नई आर्थिक नीतियों की घोषणा करने के अवसर के रूप में करता है।

मसलन 1978 में 11वीं सीपीसी सेंट्रल कमिटी की यह तीसरी प्लीनम ही थी जिसमें देंग जियाओ पिंग ने अपने ऐतिहासिक सुधारों के उपायों की घोषणा की थी और चीनी अर्थव्यवस्था को खोल दिया था। उसी तरह 1993 में 14 वीं सीपीसी सेंट्रल कमिटी की भी यह तीसरी प्लीनम थी जिसमें आर्थिक सुधारों के दूसरे दौर के रूप में समाजवादी बाजार वाली अर्थव्यवस्था की घोषणा की गई।

 

जिससे बाद में तेजी से आर्थिक विकास हुआ। इसलिए इसमें हैरानी की कोई बात नहीं कि चीन के नए नेतृत्व जी जिनङ्क्षपग और ली केक्यांग से इस तीसरी प्लीनम से बहुत सारी अपेक्षाएं भी की गई थीं। हालांकि प्लीनम के बाद में जो आधिकारिक  विज्ञप्ति जारी की गई उससे ऐसा लगा कि मानों विरोधाभासों के संदेशों से भरा एक बंडल भेजा गया है।

 

इसने कई पर्यवेक्षकों को खासा निराशा कर दिया। इस तीसरी प्लीनम की दो दिवसीय बैठक के बाद 60 बिंदुओं वाले ‘गहराते सुधारों के संबंध में कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के निर्णयोंÓ का जो पुलिंदा थमाया गया उसमें अनेक महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों के उपाय बताए गए थे।

 

सुधार के ये उपाय बाजार की भूमिका और राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था से लेकर न्यायिक सुधारों  तथा ग्रामीण सुधारों से लेकर भ्रष्टाचार से लडऩे से संबंधित थे। इनमें जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण था,वो यह कि इनमें बाजार को संसाधनों के आवंटन में निर्णायक भूमिका निभाने की अनुमति देकर प्राइवेट सेक्टर के लिए दायरा बढ़ाने की बात कही गई।

 

ये उपाय स्पष्ट रूप से संसाधनों के मामले में बड़ी सीमा तक प्रतिस्पद्र्धा उत्पन्न कर और उनसे आर्थिक कुशलता बढ़ा कर चीन के राज्य के स्वामित्व वाले भारी-भरकम उद्यमों के सुधारों को लक्ष्य करने वाले हैं। गौरतलब है कि यह प्रयास चीन की अर्थव्यवस्था में राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों की प्रभावी स्थिति के बावजूद उनके बदलाव के विरोध और सुधार करने की क्षमता को कमतर आंकता है।

 

इन सुधारों का लक्ष्य उस भ्रष्टाचार को भी,अगर पूरी तरह से खत्म न किया जा सके तो, कम करना है जो राजनीतिज्ञों और राज्य के स्वामित्व वाले भारी-भरकम उद्यमों के बीच पनपने वाले अंतर्सबंधों से उत्पन्न होता है। हालांकि यह सब करने की बजाए कहनाए बहुत आसान है।

 

चीनी राजनीतिक अर्थव्यवस्था मेें राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों का नियंत्रण राजनीतिक ताकत और आय का स्रोत है। यह आय इन उद्योगों में नौकरियां दिलाने,ठेके दिलाने के साथ राज्य की सम्पत्ति के उपयोग (और दुरुपयोग) के साथ ही जमीनों से अर्जित की जाती है।

 

इस तरह से कहा जा सकता है कि आज चीन में राज्य के स्वामित्व वाले उद्योग एक शक्तिशाली लॉबी और स्वार्थी समूह भी बनाते हैं। ऐसे में उनमें सुधार करना जी-ली नेतृत्व के लिए एक कड़ी परीक्षा होगी। अब ये उद्योग ऐसे स्रोत नहीं रहे जिनके आधार पर सरकारी बैंकों से कम ब्याज दरों पर ऋण लिया जा सके या सब्सिडी वाली भूमि अथवा विशेषाधिकार वाले आवास हासिल किए जा सकें।

 

वास्तव में चीनी नेतृत्व पहले से ही इन सुधारों की दिशा में आगे बढ़ चुका है। ऐसी रिपोट्र्स भी हैं कि वे यह सब भारतीय अनुभवों से सीख रहे है, मसलन किस तरह से भारत में सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों के अधिकारियों को आवास कैसे आवंटित किए जाते हैं।

 

एक अन्य महत्वपूर्ण सुधार का लक्ष्य बैंकिंग सेक्टर को लेकर है जिसमें ब्याज दरें और उदारीकरण शामिल है। एक बार फिर कहा जा सकता है कि इस मामले में भी भारत उनका एक रोल मॉडल बन सकता है जहां केंद्रीय बैंक को कानूनी रूप से स्वतंत्रता हासिल है तो बाजार की शक्तियों के प्रभाव के साथ एक नियोजित अर्थव्यवस्था भी है।

 

चीनी मुद्रा युआन का उदारीकरण भी ऐसे ही सुधारों की प्रक्रिया में है। इन पर भारत सरकार में बैठे अर्थव्यवस्था के प्रबंधकों और इसके मैन्यूफैक्चरिंग व सर्विस सेक्टर  के अधिकारियों को कड़ी नजर रखने की और उसके मुताबिक योजना बनाने की जरूरत है।

 

अब तक चीनी अर्थव्यवस्था की सफलता कम मजदूरी के आधार पर सस्ते निर्यात, सरकारी उद्यमों को कम ब्याज दरों से मिलने वाले धन से उत्पन्न इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकारी बजट के समर्थन से भूमि की बिक्री से संचालित होती रही है। अब वहां हालात बदलते जा रहे हैं। अब चीन में मजदूरी बढ़ रही है तो क्षमता से अधिक औद्योगिक उत्पादन ओर निर्माण के क्षेत्र में भारी-भरकम बूम अब जोखिम तक की स्थिति में आ गया है।

 

यह मानी हुई बात है कि स्थानीय सकल घरेलू उत्पादन यानी जीडीपी में उछाल लाने के लिए स्थानीय अधिकारियों द्वारा भूमि हथियाई जाती है,वो भी चीन में विरोध के बड़े कारणों में से एक है। ऐसे में कहा जा सकता है कि सरकारी उद्यमों में सुधारों को लागू करना – यानी कुछ एकाधिकारों को खत्म करना ओर अक्षम संस्थानों को बंद करना- छंटनी की ओर बढऩा और श्रमिकों में असंतोष पैदा करने की ओर बढऩा होगा।

 

चीन के विशिष्ट वर्ग के लिए यह कुछ चिंताजनक बात है और संभव है कि इसकी सफाई भी चाही जाए कि तीसरी प्लीनम ने सुधारों पर नजर रखने के लिए एक समर्पित नेतृत्व के साथ ही उस राज्य सुरक्षा परिषद की जरूरत क्यों महसूस की जो अपना ध्यान मुख्यत: आंतरिक राजनीतिक स्थिरता पर केंद्रित करेगी।

(Original text)

The Communist Party of China (CPC) held the third plenary of its 18th Central Committee earlier this November. The plenum is a meeting of the 205 members of Central Committee and 171 alternate members to discuss and arrive at major policy decisions. The significance of the third plenum of any central committee lies in the fact that a new leadership usually uses the occasion to announce important economic policies.

Newly built apartment blocks in Harbin capital of China's Heilongjiang Province

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For instance, it was at the third plenum of the 11th CPC Central Committee in 1978 that Deng Xiaoping announced the historic measures to reform and open up the Chinese economy. It was also at the third plenum of the 14th Central Committee in 1993 that the idea of the ‘socialist market economy’ was announced, setting off a second round of economic reforms and subsequent rapid economic growth.

It was therefore, not surprising that much was expected of the new Chinese leadership of Xi Jinping and Li Keqiang at latest third plenum. While the communiqué issued at the end of the Plenum appeared to send a bundle of contradictory messages and left many observers disappointed, the follow-up 60-point “Decision on Several Major Questions about Deepening Reform” announced two days after the end of the 3rd Plenum, contained several important economic reform measures. These ranged from the role of the market vis-à-vis the state-controlled economy to judicial reforms, and from rural reforms to fighting corruption.

Chief among these is the call to increase the space for the private sector by allowing the market “to play the decisive role in the allocation of resources”. This measure is clearly targeted at reforming China’s massive State-Owned Enterprises (SOEs) by introducing a greater degree of competition for resources and thereby raising economic efficiency. Simultaneously, the effort is also to undermine the ability of the SOEs to resist change and reform given their dominant positions, even monopolies, in major sectors of the Chinese economy.

These reforms are also targeted at reducing, if not eliminating altogether, the huge corruption that results from the close nexus between the political leadership and the SOEs. However, this is easier said than done. Control of the SOEs in the Chinese political system are a source of political power and income coming as it does with opportunities to dispense favours such as jobs and contracts as well as to use (and misuse) state assets including land. Thus, Chinese SOEs today form powerful lobbies and interest groups and reforming them will therefore be a big test for the Xi-Li leadership.

Under the reforms suggested, SOEs are no longer likely to receive low-interest loans from the state-controlled banking system nor subsidized land or privileged housing. The Chinese leadership is, in fact, already moving fast on implementing these measures with reports that they are trying to learn from the Indian experience of how, for instance, housing for government and PSU officials is allocated.

Other important reform measures are targeted at the banking sector and include interest-rate liberalization. Here again, India could be a role model given the statutory independence of its central bank and its experiences as a planned economy with an influential role for market forces. Currency liberalization is also on the anvil, including opening up the Chinese Yuan capital account and gradually letting the Yuan to float at least partially. This is something that both India’s economic managers in government and its manufacturing and service sectors need to watch closely and plan for.

China’s economic success has so far been driven by cheap exports based on low wages, infrastructure built by SOEs with low-interest bank funding, and government budgets supported by the selling of land. However, wages are rising in China, there is industrial overcapacity and the massive construction boom has led to risks from property bubbles. Indeed, in its current 12th Five-Year Plan, the government has called for wage increases in order to allow labour-intensive industries to gradually shut shop, among other things.

Meanwhile, it is well-known that land grabs by local officials driven by the need to boost local GDP are one of the biggest causes of protests in China, today. But the implementation of reforms of the SOEs – the ending of certain monopolies and the closure of inefficient organizations – can also lead to layoffs and still further unrest in the form of labour protests.

This is a potentially worrisome situation for China’s elites and could possibly explain why the 3rd Plenum also felt the need for a dedicated leadership group to oversee the reforms as well as a new State Security Council that will possibly have as its major focus, the maintenance of internal political stability.

 

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