How Red is my Communist?

(original text in English follows below the Hindi text)

माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी में भारतीय राजनीतिक दलों की सारी खूबियां हैं भी और नहीं भी। मसलन पार्टी में नीतिगत मसलों के नाम पर पार्टी नेताओं को बीच गुटबाजी और आपस में टकराव आम है। दुनिया भर के दूसरे राजनीतिक दलों में भी यह बीमारी है। चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी यानी सीपीसी भी इसकी अपवाद नहीं है।

हालांकि सीपीएम जैसी माक्र्सवादी पार्टी अपनी गलतियों को मानने और उसका विश्लेषण करने में दूसरे भारतीय राजनीतिक दलों से ज्यादा सक्षम साबित हुई है। इसके साथ ही वह कुछ राजनीतिक दलों में से एक है जो व्यक्तिगत या वंशवादी नेतृत्व के उलट सामूहिक नेतृत्व में विश्वास दिखाता नजर आता है।

भारतीय राजनीति में कम ही दल सीपीएम की तरह अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर इतना ज्यादा ध्यान केंद्रित करते नजर आते हैं। वास्तव में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी का 1964 में विभाजन भी चीन-सोवियत के वैचारिक मतभेदों के आधार पर हुआ था। चीनी कम्यूनिस्टों का पक्ष लेने वालों ने माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना की थी। इसलिए आज यह जानना दिलचस्प होगा कि सीपीएम चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के बारे में क्या सोचती है। आखिर सीपीसी और सीपीएम में क्या समानताएं और असमानताएं हैं।

पिछले महीने कोझिकोड में सीपीएम के 20वें अधिवेशन में ‘कुछ वैचारिक मुद्दों पर प्रस्ताव’ लाए गए थे। इन प्रस्तावों में इस बात की प्रशंसा की गई कि चीन में सुधार के दौर में निजी सेक्टर के तेज विस्तार के बावजूद सार्वजनिक सेक्टर मजबूत बना हुआ है। रणनीतिक सेक्टरों पर उसी का नियंत्रण है और उसकी संपत्ति का विस्तार हो रहा है। हालांकि सीपीएम इस बात को भी रेखांकित कर रही है कि चीन में असमानता, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार बढऩे के साथ कई नई दिक्कत पैदा करने वाली प्रवृतियां भी बढ़ी हैं।

प्रस्ताव में चीन को एक ‘सोशलिस्ट’ देश करार दिया गया लेकिन इससे कई प्रतिनिधि इत्तेफाक नहीं रखते थे। वास्तव में प्रस्ताव में इस बात पर साफ चिंता जताई गई थी कि चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी में जिस तरह से पूंजीवादियों को स्वीकार करने की प्रवृति बढ़ी उससे इसके वैचारिक और राजनीतिक विचलन का खतरा पैदा हो सकता है।

सीपीएम की नज़र में चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी में अब साम्राज्य विरोधी रुझान नहीं रह गया है और यह भी एक बड़ी समस्या है। हालांकि इस आलोचनात्मक नजरिये के बावजूद माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के अंदर में होने वाले सुधारों से सीखने की कोशिश की है। मसलन 20वीं पार्टी कांग्रेस ने सचिवों का कार्यकाल सीमित करने का फैसला किया। महासचिव को तीन कार्यकाल के लिए चुना जा सकता है।

यह अब भी चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के शीर्ष पदाधिकारियों की तुलना में एक कार्यकाल ज्यादा है। लेकिन यहां एक और मुद्दा अहम है। चीन ने 1980 के दशक में पार्टी और सरकार में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की उम्र सीमा लागू की थी। सीपीएम के प्रस्ताव में इसे लागू नहीं किया गया। भारत के दूसरे दलों की की तरह ही सीपीएम बूढ़ों की पार्टी की अपनी छवि बनाए हुए है।

चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की एक ख्रासियत यह है कि यह सीखने और कुछ नया करने को तत्पर दिखती है। यही वजह है कि उन्होंने स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक नीतियां बनाईं और उन्हें लागू किया। चीनी कम्यूनिस्टों की सफलता में इसका बड़ा हाथ रहा है। माओ और उनके साथियों ने भी अपनी क्रांति के लिए कमजोर औद्योगिक विकास वाले चीन के श्रमिकों की तुलना में किसानों की विशाल आबादी को अपने अग्रिम मोर्चे में रखा था। लेकिन भारत में नक्सलवादियों के आने तक कम्यूनिस्ट इस तरह की उपलब्धि से महरूम थे।

उनके आने के बाद ही मध्य भारत में आदिवासी अपने अधिकारों के लिए पहली बार संगठित हो सके। इस तरह मुख्यधारा के वामपंथ ने ऐतिहासिक तौर पर भारतीय समाज में जाति के महत्व पर भी कम ही ध्यान दिया। यहां तक कि 20वीं कांग्रेस में भी दलित मुद्दों पर एक सरसरी निगाह ही डाली गई। ये तमाम मुद्दे ऐसे थे, जो भारतीय वामपंथ खास कर सीपीएम को समाज के पिछड़े समूहों को संगठित करने और उनके आंदोलन को दिशा देने का मौका दे रहे थे।

लेकिन सीपीएम को अब तक इसमें नाकामी ही मिली है और इस तरह वह दूसरे राजनीतिक संगठनों और विचारधाराओं को इनमें जगह बनाने का मौका देती रही। एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर सीपीएम की मौजूदगी अब भारत के पांच राज्यों से बाहर नहीं है। इसके सदस्यों की संख्या बढ़ नहीं रही है। जबकि चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी ने आर्थिक सुधार के दौर में भी अपनी सदस्यता संख्या बढ़ा कर आठ करोड़ कर लिया है।

यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि सदस्यों का चुनाव करते समय सीपीसी का नजरिया लगातार भेदभाव रहा है। समतावाद के पार्टी के वैचारिक आधार से काफी दूर। यहां तक कि कई पूंजीवादी उद्योगपति भी अब सीपीसी के सदस्य हैं क्योंकि उनके पास संपर्क भी थे और पार्टी में शामिल होने का आधार भी।

चाहे कैसा भी राजनीतिक सुधार हो, किसी ने किसी तरह से उसकी कोशिश सीपीसी को सत्ता में बनाए रखने की तरफ ही है। भले ही सीपीएम, चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी में हुए कुछ बेहतर बदलावों को अपनाने में नाकाम रही हो लेकिन वह इसके कुछ असभ्य तरीकों को आत्मसात करने में आगे रही है।

पश्चिम बंगाल और केरल जैसे अपने मजबूत राजनीतिक गढ़ में इसके कार्यकर्ताओं ने भी चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की तरह ही कानून को अपने हाथ में लेना शुरू किया। उन पर हिंसा और लोगों की जिंदगी में हस्तक्षेप करने का भी आरोप लगा। ये वही आरोप हैं जो सीपीएम पश्चिम बंगाल में नक्सलवादियों पर लगाती रही है।

इन तमाम तथ्यों के बावजूद सीपीएम अब भी आंतरिक तौर पर काफी हद तक लोकतांत्रिक पार्टी बनी हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर इसने प्रगतिशील मूल्य और संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर भी की है। यह चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की तरह अति राष्ट्रवाद की शिकार नहीं है। आम श्रमिकों और किसानों के हितों की सुरक्षा के प्रति उसमें जबरदस्त प्रतिबद्दता भी दिखी है।

कई भारतीय उभरते चीन की चमक-दमक देख रहे हैं और इसके काले पक्ष को नजरअंदाज कर रहे हैं। जो लोग सीपीएम को सीपीसी की नकल करते हुए देखने की इच्छा रखते हैं उन्हें थोड़ा सावधान हो जाना चाहिए।

This is a slightly modified version of the translation published as:  जबिन टी. जेकब, “चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की नीतियों से सीखें,” Business Bhaskar, 29 May 2012, p. 4.
(original text)

The Communist Party of India (Marxist) is both like and unlike any other Indian political party. There are, for example, factional fights and personality clashes under the guise of differences over party policy. This is pretty much the case with political parties the world over, including the Communist Party of China (CPC).

However, left parties like the CPI (M), are somewhat more capable than other Indian political parties, of admitting their mistakes and analyzing them in careful detail. It is also one of the few Indian parties around that can be identified by a collective leadership rather than just one or two individual leaders or a political dynasty. There are also very few Indian political parties that devote so much attention to international issues, at all levels of their organization, as the Left parties.

Indeed, the Communist Party of India split in 1964 broadly reflected Sino-Soviet differences over doctrine with those who formed the CPI (M) siding with the Chinese communists. It is therefore, interesting to consider what the CPI (M) thinks of the CPC of today and to compare and contrast the two parties.
At the 20th Party Congress of the CPI (M) held in Kozhikode in Kerala, last month, the “Resolution on Some Ideological Issues”, noted admiringly that despite the rapid expansion of the private sector in the reforms era, the public sector in China has remained strong, controlling the strategic sectors and even expanding its assets. At the same time, the CPI (M) also observed that “new problems and disturbing trends are cropping up” in China, including increasing inequality, unemployment and corruption.

While China is characterized as a ‘socialist’ country in the Resolution, there were many delegates at the Congress who disagreed. Indeed, the Resolution clearly expressed concerns about what the admission of capitalists into the CPC implied for its ideological and political orientation. In the CPI (M)’s view, the CPC no longer had an anti-imperialist direction and this too was a “problem.”

Nevertheless, the CPI (M) attempted also to learn from reforms within the CPC. The 20th Party Congress for example, decided to limit the terms of secretaries, including the general secretary to three terms – still one term more than top functionaries in China. But another important reform adopted by the Chinese in the 1980s – of imposing age limits for senior Party (and government) functionaries –failed to be adopted. Like many Indian parties therefore, the CPI (M) too exhibits a tendency towards domination by a powerful gerontocracy.

An important characteristic of the Chinese communist party has been its willingness to learn and to innovate. Among the many reasons for the communists succeeding in China was their clear-eyed understanding that their ideology needed to be adapted in order to work in Chinese conditions. Thus, far from depending on the proletariat in a poorly industrialized China, Mao and his cohort mobilized China’s vast peasantry as the vanguard of their revolution.

The communists in India achieved no comparable feat and it was not until the arrival of the Naxalites that the tribals of central India were first organized to defend their rights. Similarly, the mainstream Left has also historically paid little attention to the importance of caste in Indian society – even in the “Political Resolution” adopted at the 20th Congress, Dalit issues get only a cursory mention. In each case, there were opportunities for India’s communists, particularly the CPI (M), to mobilize and organize these downtrodden groups. So far, however, it has failed to do so and thus, continues to cede space to other political organizations and ideologies.

While the CPI (M) does not have a presence as a political party beyond about five Indian states and its membership remains stagnant, the CPC has expanded its membership in the reforms era to about 80 million cadres. It should be noted however, that the CPC’s selection criteria are increasingly discriminatory and a far cry from the Chinese party’s egalitarian roots. Also, many, including capitalist entrepreneurs, become CPC members because of the connections and privileges it offers. Whatever ‘political reforms’ are undertaken, are geared towards preserving the CPC in power.

The CPI (M) is unfortunately similar to the CPC in some unsavoury aspects. Where it is a strong political force such as in West Bengal and in Kerala, CPI (M) activists have behaved pretty much like their Chinese counterparts in being a law unto themselves and engaging in violence and intimidation – ironically, the same accusations that it has made against the Naxalites in West Bengal.

Nevertheless, in comparison to other Indian parties, the CPI (M) remains a fairly democratic party internally, and at the national level, has resolutely stood for progressive values, and for adherence to the Constitution. It is not prone to extreme nationalism as the CPC is and maintains a vigorous commitment to defending the rights of ordinary workers and peasants.

Indians who only see the gloss of a rising China and not its warts, and wish the CPI (M) to emulate Chinese communists, must be careful what they wish for.

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