China and India’s Agni-V Missile Test

(original text in English follows below the Hindi text)

देश और इससे बाहर, पांच हजार किलोमीटर तक मार करने वाली अग्नि -5 मिसाइल के सफल परीक्षण की व्याख्या हो रही है। माना जा रहा है इसका निशाना चीन है। इस मिसाइल की सफल तैनाती से पूरा चीन भारत के परमाणु हथियारों की जद में आ जाएगा। मिसाइल के इस परीक्षण से देश के कुछ हलकों में एक उत्साह का माहौल दिखाई दे रहा है।

बहरहाल, कड़वा यथार्थ यही है कि परमाणु हथियार की क्षमता हासिल होने की थोड़ी सी भी सुगबुगाहट हो तो प्रतिस्पद्र्धियों हमला करने से विचलित हो जाते हैं। उत्तरी कोरिया और इसके अंतरराष्ट्रीय संबंध यह साबित करने के लिए काफी हैं। अगर पहले नहीं तो कम से 1998 तक तो भारत ने चीन के खिलाफ परमाणु क्षमता हासिल कर ही ली थी। हालांकि यह भी नहीं कहा जा सकता कि ऐसा नहीं होता तो चीन भारत के खिलाफ हमले की योजना बना डालता।

वर्ष 1978 से ही चीन ने आर्थिक सुधार शुरू कर दिए थे और इसके बाद ही उसकी प्रमुख चिंता अपने लोगों को गरीबी के दायरे से बाहर निकालने और खुद को एक जिम्मेदार ग्लोबल ताकत साबित करने की रही है। अगर चीन परमाणु या किसी अन्य मामले का बहाना बनाकर भारत को छेड़ता है तो यह उसके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

चीन और भारत दोनों यह अच्छी तरह जानते हैं कि अपने परमाणु हथियारों की तादाद बढ़ाने या उनकी रेंज में इजाफा करने के बावजूद यह यथार्थ नहीं बदलता कि इनका इस्तेमाल की नौबत न आने देना ही सबसे अच्छी स्थिति होगी। वास्तव में इससे होने वाले नुकसान ही परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को रोके रखता है।

अग्नि-5 मिसाइल के परीक्षण पर चीन की प्रतिक्रिया दिलचस्प है। मिसाइल की कुछ खासियतों को लेकर नुक्ताचीनी की गई है। चीनी टिप्पणियों में यह दावा किया जा रहा है कि यह एक अंतरद्वीपीय रेंज की बैलिस्टिक मिसाइल है जबकि कुछ में कहा गया है इसकी रेंज 8,000 किलोमीटर तक है। कुछ अग्नि मिसाइल के निशाने की सटीकता पर सवाल उठा रही हैं और कहा जा रहा है कि ठोस ईंधन और त्रिस्तरीय महाद्वीपीय चीनी मिसाइल देंगफेंग 31-ए गुणवत्ता में इससे कहीं आगे है।

जहां तक राजनीतिक असर का सवाल है तो भारत का मुखर आलोचक और उसके खिलाफ अक्सर भड़काऊ टिप्पणी करने वाला सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपने संपादकीय में कड़ी चेतावनी दी है। अखबार ने कहा है कि भारत को अपनी ताकत और अपने पश्चिमी सहयोगियों के महत्व का बढ़चढ़ कर आकलन नहीं करना चाहिए। अखबार का कहना है कि भारत अहंकारी है। टिप्पणी में यह भी कहा गया है कि चीन परमाणु ताकत में कहीं आगे है और ज्यादा विश्वसनीय भी। आने वाले दिनों में भारत चीन के साथ हथियारों की दौड़ में पिछड़ जाएगा।

चीन के सरकारी मीडिया में भारत के खिलाफ इस तरह की टिप्पणियों को दुश्मनी और अहम से भरा माना जा सकता है। कहीं न कहीं यह चीन के मीडिया में की जाने वाली टिप्पणियों के ट्रेंड को ही दर्शाता है। चीन के मीडिया में इस तरह की टिप्पणियां भारत की उपलिब्धयों को खारिज करने वाली और श्रेष्ठता बोध से भरी होती हैं। हालांकि चीन के अंदर यह नाराजगी भरी स्वीकृति बढ़ती जा रही है कि भारत एशिया में एक बड़ी ताकत बनता जा रहा है उसे इसका सामना करना होगा।

मिसाल के तौर पर ‘ग्लोबल टाइम्स’ में 9 अप्रैल छपी टिप्पणी में कहा गया कि भारत पड़ोसियों के चीन के सीमा विवाद का फायदा उठा रहा है। चीन के खिलाफ भारत अपनी रणनीति में इसका बखूबी इस्तेमाल कर रहा है। अखबार दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के साथ मिलकर भारत के तेल खोज अभियान का हवाला दे रहा था। अखबार का मानना था कि चीन को इस तरह के मामले को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के लिए आगे आना चाहिए।

ऐसे दौर में जब चीन इन मसलों पर आक्रामक तेवर अपनाता हुआ दिखता है तो अखबारों की इस तरह की टिप्पणियां कहीं न कहीं एक अलग मत को दर्शाती हैं। चीन में तमाम राष्ट्रवादी आग्रहों और तेवरों के बावजूद यह अहसास भी बढ़ता जा रहा है कि अगर सारे पड़ोसी देश उसके खिलाफ लामबंद हो जाते हैं तो मुश्किल खड़ी हो सकती है।

‘ग्लोबल टाइम्स’ में अग्नि पर लिखा गया संपादकीय भी ज्यादा जिम्मेदार और संतुलित टिप्पणी के साथ खत्म होता है। इसमें साफ कहा गया है कि भारत और चीन के लिए मिसाइल विकसित करके शक्ति संतुलन स्थापित करने का कदम गलत फैसला होगा। हालात को काबू से बाहर न जाने की जिम्मेदारी चीन पर भी है। एशिया की भू-राजनीतिक हालात काफी कुछ भारत और चीन के संबंधों पर आश्रित है। ग्लोबल टाइम्स की संपादकीय में यह भी स्वीकार किया गया है कि इस सदी को एशिया का बनाने में चीन के साथ भारत की भी काफी बड़ी भूमिका है। इसमें यहां तक कहा गया है कि चीन भारत को शांतिपूर्ण प्रतिस्पद्र्धी के तौर पर स्वीकार करने को तैयार रहेगा। इस सबसे यही साबित होता है कि भारत के साथ अपने संबंधों को परिभाषित करने में चीन के अंदर पर्याप्त गंभीरता है।

अब भारत और इसके लोगों को भी इसी तरह की प्रतिक्रिया दिखानी होगी। दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने में आपसी हित के मामलों को तवज्जो देना ही सही रणनीति साबित होगी। राष्ट्रवाद पर ज्यादा जोर देना आपसी रिश्तों को पटरी से उतार सकता है। हालांकि, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद कायम है और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ढांचा यही दर्शाता है कि एशिया की यह दोनों बड़ी ताकतें कई क्षेत्र में प्रतिस्पद्र्धी के तौर पर बनी रहेंगी।

हालांकि जरूरी नहीं कि यह प्रतिस्पद्र्धा विध्वसंक ही हो। बहरहाल, इस समय भारतीय सेना के आधुनिकीकरण की रफ्तार धीमी करने की वजह कोई वजह नहीं दिखती। जहां तक भारत की सैन्य क्षमता बढ़ाने खास कर परमाणु हथियार और विश्वसनीय मिसाइल डिलीवरी क्षमता हासिल करने की बात है तो यह चीन के प्रति भारत की व्यापक नीति का एक हिस्सा हो सकती है। आज के परमाणु दौर में यह एक तरह का जोखिम प्रबंधन है।

इसे एक तरह का इंश्योरेंस कवर भी कहा जा सकता है। यानी किसी भी अनहोनी के समय यह एक सुरक्षा कवच के तौर पर आपके काम आ सकता है। यह सच है क्योंकि कोई भी इंश्योरेंस पॉलिसी इस उम्मीद में नहीं ली जाती है कि किसी खास मौके पर इसे क्लेम किया जाएगा। यह हमेशा सुरक्षा कवर के लिए ही होती है। चीन के प्रति भारत की मौजूदा नीति को भी इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए।

This is a corrected version of the translation published: जबिन टी. जेकब, “अग्निपथ से नहीं गुजरेगा चीन-भारत संबंध,” Business Bhaskar, 21 April 2012, p. 4.

(original text)

The successful test of the Agni-V missile with a range of 5,000 kilometres is being widely interpreted both in India and abroad as aimed against China. Certainly, the successful deployment of the missile will bring all of China within the reach of India’s nuclear weapons and there is even a celebratory air in some sections in India as a result.

Nevertheless, the hard reality of the nuclear age is that even a hint of nuclear weapons capability, let alone the quality of delivery mechanisms, is practically sufficient to deter offensive action by potential adversaries. The case of North Korea and its international relations is a case in point. And India can be said to have achieved this position vis-à-vis China certainly by 1998, if not earlier. This is not to say that the Chinese would have contemplated launching a military attack on India if the latter did not have nuclear weapons. China’s national interests since 1978 when it began its economic reforms has been on both pulling its people out of poverty and gaining respect as a responsible global power. And conflict without provocation – nuclear or otherwise – with India or anyone else for that matter, would only be self-destructive.

Both India and China know that increasing the number of their nuclear weapons or the range of their missiles targeted at each other does not change the objective reality that the best situation for both countries is if it does not come to the use of their nuclear weapons. Such is the terror of mutually assured destruction.

The reactions from China on the Agni-5 test are interesting. There is some nitpicking about the specific features of the Agni-V with some claiming it is not really an inter-continental range ballistic missile while others state that the missile is capable of going over 8,000 kilometres. There are also doubts about the Agni-V’s accuracy and claims that China’s own Dongfeng-31A – also a solid-fuel, three-stage inter-continental ballistic missile – is much better in quality.

Telemetry Data Awaited

“Telemetry Data Awaited”

Coming to the political ramifications, the Chinese state-run Global Times newspaper – which is often more provocative and strongly critical of countries seen as potential rivals to China – warned in an editorial that, “India should not overestimate its strength” or “the value of its Western allies”. It suggested that India was “arrogant” and declared that “China’s nuclear power is stronger and more reliable” and that “[f]or the foreseeable future, India would stand no chance in an overall arms race with China”.

These statements in China’s official media can be considered unfriendly and just as arrogant, and is part of a trend of Chinese commentary that is often dismissive and condescending as far as India and its foreign policy is concerned. But increasingly, there is also grudging acknowledgement that India is a major player in the region that China will have to contend with. For example, a commentary from 9 April, in the same Chinese newspaper, talks of India taking advantage of China’s territorial conflicts with its neighbours as part of New Delhi’s strategic efforts to counter China. It was referring specifically to India’s joint oil exploration with Vietnam in the South China Sea. In outlining the way forward, the author suggests that China should persist with its attempts at peaceful resolution of the disputes. While China’s actions may continue to appear aggressive, such views suggest a departure from the usual strong nationalistic and belligerent rhetoric and a realization that it will be difficult for China to hold its own if its neighbours decide to gang up against it.

The Agni editorial too ends on a more nuanced and balanced note, pointing out that both China and India would be “unwise” to seek a balance of power by developing missiles. In other words, it suggests that Beijing too has a responsibility in not letting the situation to get out of hand. Similarly, by stating that “[t]he geopolitics of Asia will become more dependent on the nature of Sino-Indian relations” the Global Times editorial also acknowledges that India has an important role to play in defining the Asian century together with China. It went so far as to say that it would accept India as a “peaceful competitor.” All of this goes on to show that when it comes to India, there is some serious thinking in China about how best to deal with it.

The Indian media and public must also respond in kind, so that it is mutual interests and not jingoism that drive the relationship with China. Yes, the boundary dispute continues and the structure of the international political order suggests that the two powers will compete in many areas but such competition need not be destructive.

While there is no need to let up on India’s military modernization process, military capability – including nuclear weapons and credible missile delivery systems – can only form one part of India’s overall China policy. Further, such capability can at best form only an insurance policy in the nuclear age. And surely nobody takes insurance hoping there will be an occasion to claim it.

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