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Sino-Indian Relations: Beyond Symbolism and Beyond Belligerence

Published as जैबिन टी जैकब, ‘युद्धोन्माद से परे देखें भारत-चीन रिश्ते को’, Business Bhaskar, 13 November 2013.

Original text in English follows below

भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अक्टूबर मध्य में चीन की यात्रा और चीनी प्रधानमंत्री ली केक्यांग की मई में भारत की यात्रा पर गौर करें तो यह पहली बार हुआ है कि दोनों देशों के शीर्ष नेता एक ही साल में एक-दूसरे के यहां गए हैं। ली की यात्रा के समय देपसांग में करीब तीन हफ्ते तक जारी घुसपैठ का मामला सामने आया था,

तो सिंह के दौरे के समय दो अरुणाचली तीरंदाजों तीरंदाजों (खिलाडिय़ों) को चीन में एक प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेने के लिए जाते समय नत्थी वीजा दिए जाने का मामला सामने आया। लेकिन सच तो यह है कि भारत-चीन रिश्ते को न तो इस तरह के प्रतीकवाद और न ही युद्धोन्माद सही मायने में पेश करते हैं।

उदाहरण के लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव और चीन जनवादी गणतंत्र के राष्ट्रपति के रूप में शी जिनपिंग का ओहदा ली केक्यांग से ऊंचा है। इसी प्रकार यह तथ्य भी ध्यान रखना चाहिए कि चीनियों ने मनमोहन सिंह का अच्छा स्वागत किया है जिनकी शायद प्रधानमंत्री के रूप में यह अंतिम चीन यात्रा साबित हो।

यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि सिंह ऐसी सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो अपने घर में विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही है, इसे देखते हुए भारत एवं चीन के बीच किसी तरह की सौदेबाजी कठिन और दुष्प्राप्य थी।

दोनों महाशक्तियों के बीच रिश्ते को स्थानीय घटनाओं, क्षेत्रीय पर्यावरण और वैश्विक परिस्थितियों, इन सबका एक साथ असर होता है।